आज की डिजिटल दुनिया की हकीकत: सब ऑनलाइन पर कोई नहीं मौजूद, रिश्तों में घुल रही है खामोशी

Praggya Singh sabal5 August 20263 min read55 viewsIndia
आज की डिजिटल दुनिया की हकीकत: सब ऑनलाइन पर कोई नहीं मौजूद, रिश्तों में घुल रही है खामोशी

आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में तकनीक ने हमें दुनिया से तो जोड़ दिया है, लेकिन असलियत में हम एक-दूसरे से काफी दूर हो गए हैं। प्रो. आरके जैन “अरिजीत” ने अपनी लेखनी के माध्यम से समाज के एक कड़वे सच को सामने रखा है, जहाँ हर कोई एक चमकदार स्क्रीन के पीछे कैद है। हमारे पास बात करने के साधन तो बहुत हैं, लेकिन आपस में बातचीत का सिलसिला खत्म सा हो गया है। आज के दौर में हर चेहरा ऑनलाइन दिखाई देता है, लेकिन असल में हर मन ऑफलाइन हो चुका है।

घर और परिवार में बढ़ती डिजिटल दूरी

आज के समय में परिवारों का विघटन किसी लड़ाई-झगड़े से नहीं, बल्कि घर के अंदर छाई खामोशी से हो रहा है। भारत में एक आम व्यक्ति औसतन सात घंटे से अधिक समय स्क्रीन पर बिताता है। इनमें माता-पिता का स्क्रीन टाइम पाँच घंटे और बच्चों का चार घंटे से ज्यादा है। खाने की मेज, जो कभी परिवार के साथ बैठकर बातचीत करने की जगह हुआ करती थी, आज वहां हर कोई अपने मोबाइल पर रील्स देखने में मशगूल है। एक ही छत के नीचे रहने के बावजूद लोग अलग-अलग डिजिटल दुनिया में खोए हुए हैं। इस आदत को 'फुबिंग' कहा जा रहा है, जहाँ सामने बैठे व्यक्ति की उपेक्षा कर मोबाइल में डूबे रहना आम हो गया है।

GulfHindi की हर खबर सबसे पहलेJoin

ऑफिस और काम की बदलती दुनिया

दफ्तरों में भी दूरियां अब किलोमीटर में नहीं, बल्कि स्क्रीन की बैंडविड्थ में मापी जाने लगी हैं। वर्क फ्रॉम होम के आने से काम घर तक तो पहुंचा, लेकिन इसने सहकर्मियों के बीच के तालमेल को कम कर दिया है। आज डिजिटल मीटिंग्स में कैमरे बंद और माइक म्यूट रहते हैं। कर्मचारियों की वैल्यू उनके विचारों के बजाय स्क्रीन पर उनकी ऑनलाइन सक्रियता से तय की जाती है। तकनीक ने काम की गति तो बढ़ा दी है, लेकिन लोगों के बीच के मानवीय जुड़ाव और सहयोग का ताप कम कर दिया है।

लोकतंत्र और स्वयं से दूरी

सभ्यता का पतन तब नहीं होता जब लोग बोलना छोड़ देते हैं, बल्कि तब होता है जब वे सुनना बंद कर देते हैं। आज राजनीतिक विमर्श जनसभाओं के बजाय सोशल मीडिया एल्गोरिदम के भरोसे है। युवा समाचारों को रील्स में देख रहे हैं और अपनी नाराजगी केवल इमोजी भेजकर जता देते हैं। इससे भी बड़ा संकट यह है कि मनुष्य खुद से दूर होता जा रहा है। हमारे मन का एकांत अब सोशल मीडिया पर मिलने वाले लाइक्स और कमेंट्स से भरता है, जो असलियत में अकेलापन ही बढ़ाता है।

बदलाव की जरूरत

तकनीक खुद में कोई दुश्मन नहीं है, बल्कि उसका गलत इस्तेमाल ही बड़ी समस्या है। हम आज भी फोन-फ्री डिनर जैसे छोटे नियमों को अपनाकर रिश्तों में फिर से जान फूंक सकते हैं। कार्यस्थलों पर संवाद को अधिक जीवंत बनाने और डिजिटल दुनिया से निकलकर प्रत्यक्ष रूप से लोगों से मिलने की संस्कृति को फिर से जीवित करने की आवश्यकता है। अगर हमने समय रहते अपने रिश्तों और संवेदनाओं को डिजिटल दुनिया से नहीं बचाया, तो आने वाली पीढ़ियां हमें केवल स्मार्टफोन वाली पीढ़ी के रूप में याद रखेंगी, जिनके पास हाथ में फोन तो था, लेकिन अपनों का हाथ थामने का वक्त नहीं।

Share:

Comments

Leave a comment