माल्टा के विदेश मंत्री क्राइस फियरने ने दिया बड़ा बयान, फिलिस्तीन और टू-स्टेट सॉल्यूशन पर फिर से दोहराया समर्थन.

अंतरराष्ट्रीय राजनीति में एक बार फिर फिलिस्तीन मुद्दे पर माल्टा का रुख साफ हो गया है। माल्टा के विदेश मंत्री क्राइस फियरने ने अल जजीरा को दिए एक इंटरव्यू में यह बात खुलकर कही है कि उनका देश टू-स्टेट सॉल्यूशन यानी दो-राज्य समाधान के अपने पुराने फैसले पर पूरी तरह कायम है। यह बातचीत 23 अगस्त 2026 को प्रसारित की गई थी, जिसमें उन्होंने फिलिस्तीनी प्राधिकरण को समर्थन देने की बात दोहराई है।
वेस्ट बैंक बस्तियों और यूरोपीय संघ की भूमिका
विदेश मंत्री क्राइस फियरने ने अपने बयान में साफ किया कि माल्टा वेस्ट बैंक में इजरायली बस्तियों के विस्तार के पूरी तरह खिलाफ है। अंतरराष्ट्रीय कानून के मुताबिक इन बस्तियों को अवैध माना गया है और माल्टा सरकार भी यही मानती है। इस मुद्दे पर कड़ा रुख अपनाते हुए माल्टा इस समय यूरोपीय संघ के नौ अन्य देशों के साथ मिलकर काम कर रहा है। इन सभी देशों की कोशिश है कि यूरोपीय संघ की तरफ से एक संयुक्त बयान जारी किया जाए, जिसमें इन बस्तियों के विस्तार की कड़ी निंदा की जा सके।
व्यापार प्रतिबंधों और कूटनीतिक सहमति पर जोर
जब व्यापार से जुड़े प्रतिबंधों की बात आई, तो माल्टा के विदेश मंत्री ने स्पष्ट किया कि उनकी सरकार सीधे तौर पर अकेले कदम उठाने के बजाय यूरोपीय संघ की तय विदेश नीति के दायरे में रहकर काम करना पसंद करती है। यूरोपीय संघ के नियमों के अनुसार किसी भी बड़े फैसले पर संघ के सभी 27 सदस्य देशों की सहमति होना जरूरी होता है। यही वजह है कि माल्टा अपने बाकी साथी देशों के साथ मिलकर एक आम सहमति बनाने की कोशिश में जुटा है ताकि सामूहिक रूप से कोई मजबूत कदम उठाया जा सके।
घरेलू आलोचना और माल्टा का आधिकारिक रुख
माल्टा की लेबर सरकार को हाल ही में देश के अंदर से ही इस बात पर आलोचना का सामना करना पड़ा था कि मध्य पूर्व की राजनीति में उनका देश उतनी मजबूती से अपनी बात नहीं रख रहा है। इन सब बातों का जवाब देते हुए मंत्री फियरने ने कहा कि माल्टा का रुख हमेशा से एक जैसा और स्पष्ट रहा है, और देश ने पहले ही आधिकारिक तौर पर फिलिस्तीन को एक अलग राष्ट्र के रूप में मान्यता दे रखी है। उन्होंने यह भी याद दिलाया कि यूरोपीय संघ परिषद के सभी विदेश मंत्रियों के पास वोट देने का बराबर अधिकार होता है और माल्टा का पूरा ध्यान इस बात पर है कि जो भी कूटनीतिक कदम उठाए जाएं, वे आपसी सहमति और नियमों के दायरे में ही हों।