नेपाल में विदेशी सहायता घटने पर वित्तमंत्री डॉ. स्वर्णिम वाग्ले ने जताई गहरी चिंता, अब निजी पूंजी पर बढ़ा जोर.

नेपाल की अर्थव्यवस्था को लेकर एक बड़ी और अहम बात सामने आई है जहां देश के वित्तमंत्री डॉ. स्वर्णिम वाग्ले ने विदेशी सहायता लगातार कम होने पर अपनी चिंता खुलकर जाहिर की है। हाल ही में हुई संसदीय सार्वजनिक लेखा समिति की बैठक के दौरान उन्होंने बताया कि पिछले कुछ समय से देश को मिलने वाले अनुदान और रियायती ऋण के रास्ते धीरे-धीरे सीमित होते जा रहे हैं। हालात ऐसे बन गए हैं कि विदेशी मदद घटने के बाद अब सरकार को वैकल्पिक रूप से निजी पूंजी जुटाने के नए रास्ते तलाशने पड़ रहे हैं।
सस्ते कर्ज और अनुदान के दरवाजे बंद होने की कगार पर
वित्तमंत्री ने बैठक में विस्तार से जानकारी देते हुए बताया कि पिछले 40 वर्षों से जो अत्यधिक रियायती ऋण 1 से 1.5 प्रतिशत की कम ब्याज दर पर मिलता था और जिसकी शुरुआत के पहले आठ वर्षों तक कोई भुगतान भी नहीं करना पड़ता था, उसकी खिड़की अब लगभग बंद हो रही है। उन्होंने कहा कि आज जब वे वित्त मंत्री की कुर्सी पर बैठे हैं तो उन्हें इस बात की बड़ी चिंता सता रही है कि विकास कार्यों के लिए मिलने वाले इन आसान ऋणों के दरवाजे अब उनके देश के लिए बंद होते जा रहे हैं। नेपाल अपने पहले बजट के समय से ही राजस्व से पूरा न होने वाले खर्चों को पूरा करने के लिए विदेशी सहायता और कर्ज पर ही निर्भर रहा है।
चालू बजट में विदेशी ऋण और अनुदान के आंकड़े
बजट का आकार बढ़ने के साथ-साथ कुल बजट में विदेशी अनुदान का हिस्सा तुलनात्मक रूप से लगातार नीचे आया है। वित्तमंत्री के अनुसार चालू वित्त वर्ष के बजट में नेपाल ने लगभग 2 खरब 12 अरब नेपाली रुपये विदेशी ऋण के रूप में लेने का लक्ष्य रखा है, जबकि दूसरी तरफ विदेशी अनुदान करीब 62 अरब रुपये रहने का अनुमान लगाया गया है। पिछले कई वर्षों के आंकड़े देखें तो बजट में 48 से 52 अरब रुपये तक विदेशी अनुदान मिलने की उम्मीद की जाती थी, लेकिन असलियत में जो राशि हाथ लगती थी वह केवल 10 से 15 अरब रुपये के आसपास ही सिमट कर रह जाती थी। इसके अलावा अंतरराष्ट्रीय गैर-सरकारी संगठनों यानी आईएनजीओ के जरिए मिलने वाली सहायता में भी भारी गिरावट दर्ज की गई है।
ऋण की बढ़ती शर्तें और विकास कार्यों पर असर
बड़े-बड़े बुनियादी ढांचे और बड़े संस्थानों के पुनर्गठन के लिए जो रियायती संसाधन पहले आसानी से मिल जाते थे, वे अब बेहद कठोर शर्तों के साथ बाजार में उपलब्ध हैं। वर्तमान समय में बैंकों की ब्याज दरों में बढ़ोतरी हो रही है, ग्रेस पीरियड और ऋण चुकाने की समयसीमा घटती जा रही है, और सीमित पड़े संसाधनों को हासिल करने के लिए देशों के बीच प्रतिस्पर्धा भी काफी बढ़ गई है। वित्तमंत्री ने इस पूरे दौर को नेपाल के लिए एक बेहद चुनौतीपूर्ण समय बताया है। नेपाल को हमेशा से भारत, चीन, ब्रिटेन, जापान और अमेरिका जैसे प्रमुख देशों के अलावा एशियाई विकास बैंक यानी एडीबी और विश्व बैंक जैसे बहुपक्षीय विकास साझेदारों से द्विपक्षीय अनुदान और रियायती ऋण मिलता रहा है, जो अब सीमित हो रहे हैं।
संसाधन होने के बावजूद खर्च करने की क्षमता कमजोर
डॉ. स्वर्णिम वाग्ले ने इस बात को भी बिना किसी संकोच के स्वीकार किया कि अतीत में नेपाल को जो भी रियायती संसाधन मिले थे, उनका देश के भीतर प्रभावी तरीके से उपयोग नहीं किया जा सका। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि भले ही विदेशी सहायता उपलब्ध थी और मदद देने वाले संस्थान तैयार बैठे थे, लेकिन देश की कमजोर खर्च करने की क्षमता, जटिल खरीद प्रक्रिया और अन्य प्रशासनिक कारणों के कारण पूंजीगत खर्च उस स्तर तक नहीं पहुंच पाया जिसकी उम्मीद की जा रही थी। नेपाल के आज जितने भी महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे खड़े हैं, वे सब इन्हीं पुराने रियायती ऋणों के जरिए ही बनाए गए हैं।
निजी क्षेत्र की पूंजी और वैकल्पिक व्यवस्थाओं की ओर कदम
चूंकि पारंपरिक रूप से मिलने वाली विदेशी सहायता के सारे स्रोत अब धीरे-धीरे सूख रहे हैं, इसलिए नेपाल सरकार ने अब नई निजी पूंजी और वैकल्पिक व्यवस्थाओं की तरफ कदम बढ़ाना शुरू कर दिया है। सरकार ने निजी और वैकल्पिक पूंजी जुटाने के लिए कई नए उपकरणों को आगे किया है, जिसमें हाइब्रिड एन्युटी मॉडल, ऑफशोर बॉन्ड, डायस्पोरा निवेश और वैकल्पिक विकास वित्त से जुड़ी तमाम व्यवस्थाएं शामिल हैं। इसके अलावा एशियाई विकास बैंक और अंतरराष्ट्रीय वित्त निगम के माध्यम से अंतरराष्ट्रीय बाजार से पैसा जुटाकर नेपाली बैंकों के जरिए सीधे निजी क्षेत्र को कर्ज उपलब्ध कराने के रास्ते भी खोल दिए गए हैं। गैर-आवासीय नेपालियों यानी एनआरएन के निवेश को और अधिक आसान बनाने के लिए सभी प्रकार की कानूनी और नियामकीय बाधाओं को दूर कर दिया गया है और इससे जुड़ा नया कानून भी संसद से पास हो चुका है।