नेपाल के पीएम बालेन्द्र शाह का सुप्रीम कोर्ट को जवाब, भ्रष्टाचार खत्म करने के लिए एंटी करप्शन ब्यूरो अकेला काफी नहीं

Nura Basta21 August 20264 min read62 viewsWorld
नेपाल के पीएम बालेन्द्र शाह का सुप्रीम कोर्ट को जवाब, भ्रष्टाचार खत्म करने के लिए एंटी करप्शन ब्यूरो अकेला काफी नहीं

काठमांडू में भ्रष्टाचार के मामलों को लेकर नेपाल की राजनीति में एक बार फिर बड़ी हलचल देखने को मिल रही है। नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन्द्र शाह ने देश के उच्चतम न्यायालय यानी सुप्रीम कोर्ट को अपना लिखित जवाब सौंप दिया है। प्रधानमंत्री ने साफ शब्दों में कहा है कि देश में फैले भ्रष्टाचार और अवैध संपत्ति को छुपाने की पुरानी आदतों को केवल एंटी करप्शन ब्यूरो के बूते पूरी तरह से खत्म करना बिल्कुल संभव नहीं है। सरकार की तरफ से जो संपत्ति जांच आयोग का गठन किया गया था, उसे खारिज करने की मांग को लेकर अदालत में एक रिट याचिका दायर की गई थी। इसी याचिका पर अपना जवाब देते हुए प्रधानमंत्री ने जांच आयोग की जरूरत पर जोर दिया है और बताया है कि ब्यूरो और इस आयोग के काम करने के तरीके और अधिकार क्षेत्र में बड़ा अंतर है।

अख्तियार दुरुपयोग अनुसंधान आयोग की अपनी सीमाएं

प्रधानमंत्री के द्वारा दिए गए आधिकारिक जवाब में यह बात सामने आई है कि देश के संविधान के मुताबिक किसी भी सरकारी पदाधिकारी या कर्मचारी की संपत्ति की जांच करने और उस पर मुकदमा चलाने का अधिकार सिर्फ एक संवैधानिक निकाय के पास है, जिसे अख्तियार दुरुपयोग अनुसंधान आयोग कहा जाता है। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि नेपाल देश भर में लंबे समय तक सत्ता के पदों पर रहे लगभग सभी बड़े राजनीतिक नेताओं और ऊंचे पदों पर काम करने वाले कर्मचारियों की अकूत संपत्ति का एक साथ संग्रह करना, उसकी जांच करना और उस पर रिसर्च करना अकेले अख्तियार के बस की बात नहीं दिखती है। अख्तियार के पास काम का बहुत ज्यादा दबाव है और संसाधनों की भी कुछ सीमाएं हैं, जिसकी वजह से हर मामले की गहराई तक पहुंचना आसान नहीं होता है।

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जनता की आशंकाओं को दूर करने के लिए जरूरी है जांच आयोग

प्रधानमंत्री बालेन्द्र शाह ने अपने जवाब में आगे बताया कि देश के अंदर आज भी ऐसे कई समूह सक्रिय हैं जो भ्रष्टाचार को बढ़ावा देते हैं और अवैध तरीके से अकूत संपत्ति कमाने के बाद उसे चालाकी से छुपा देते हैं। इस तरह के भ्रष्ट समूहों पर राज्य सरकार की तरफ से समय पर शिकंजा नहीं कसा गया और अगर उन्हें सजा नहीं मिली, तो आम जनता के मन में शक पैदा होना स्वाभाविक है। जनता के मन में सरकार और व्यवस्था को लेकर जो डर और आशंकाएं बैठी हुई हैं, उन्हें पूरी तरह से खत्म करने के लिए ही एक अलग से संपत्ति जांच आयोग का गठन करना बेहद आवश्यक हो गया था। सरकार का यह कदम पारदर्शिता लाने की दिशा में एक बड़ा प्रयास है ताकि देश की जनता का भरोसा कानून और प्रशासन पर फिर से कायम हो सके।

कौन-कौन शामिल है इस विशेष आयोग में

आपकी जानकारी के लिए बता दें कि इस विशेष संपत्ति जांच आयोग की कमान पूर्व न्यायाधीश राजेन्द्र भण्डारी को सौंपी गई है, जिन्हें इस आयोग का अध्यक्ष बनाया गया है। इसके अलावा इस आयोग में कई जाने-माने और अनुभवी लोगों को सदस्य के रूप में शामिल किया गया है। आयोग के अन्य सदस्यों में तत्कालीन पुनरावेदन अदालत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश पुरुषोत्तम पराजुली, उच्च अदालत के पूर्व न्यायाधीश चण्डीराज ढकाल, पूर्व पुलिस नायब महानिरीक्षक गणेश केसी और जाने-माने चार्टर्ड अकाउंटेंट प्रकाश लम्साल शामिल हैं। इन सभी दिग्गजों की देखरेख में यह आयोग देश में अवैध संपत्ति और भ्रष्टाचार के मामलों की गहन जांच-पड़ताल कर रहा है ताकि दूध का दूध और पानी का पानी हो सके।

सुप्रीम कोर्ट में क्या चल रहा है मामला

इस नवनिर्मित आयोग के गठन और इसके अधिकारों को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में एक रिट याचिका दायर की गई थी। इस मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट के दो न्यायमूर्तियों टेकप्रसाद ढुंगाना और श्रीकांत पौडेल की संयुक्त पीठ ने पहले एक अंतरिम आदेश जारी किया था। इस आदेश में कहा गया था कि इस पूरे मामले को आगे की सुनवाई के लिए अदालत की पूर्ण पीठ के समक्ष पेश किया जाए। हालांकि, पीठ के आदेश के अनुसार जब तक मामला पूर्ण पीठ के सामने पेश होता, उससे पहले ही देश के प्रधान न्यायाधीश डॉ. मनोजकुमार शर्मा ने एक प्रशासनिक निर्णय लेते हुए इस पूरे विवादित मामले को सीधे संवैधानिक पीठ के समक्ष सुनवाई के लिए भेजने का बड़ा फैसला लिया। इस मामले की विस्तृत जानकारी आप हिन्दुस्थान समाचार की रिपोर्ट में देख सकते हैं, जहां इस पूरी कानूनी प्रक्रिया को विस्तार से कवर किया गया है।

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