नेपाल पुलिस ने माँगा फोन कॉल्स सुनने का अधिकार, अपराध रोकने के लिए सरकार के सामने रखी बड़ी मांग

नेपाल पुलिस ने देश में अपराधों की जांच को तेज और मजबूत बनाने के लिए सरकार के सामने एक नया प्रस्ताव रखा है। इस प्रस्ताव के तहत पुलिस ने मांग की है कि उन्हें अपराधियों की गतिविधियों पर नजर रखने के लिए कॉल इंटरसेप्शन यानी फोन कॉल को रियल टाइम में सुनने और रिकॉर्ड करने का कानूनी अधिकार दिया जाए। यह अधिकार मिलने के बाद पुलिस अधिकारियों को यह सुविधा मिल जाएगी कि वे किसी भी संदिग्ध व्यक्ति की फोन पर चल रही बातचीत को तुरंत सुन सकें और उसे रिकॉर्ड कर सकें ताकि अपराधियों तक आसानी से पहुंचा जा सके।
रणनीतिक योजना में शामिल हुआ कॉल इंटरसेप्शन का प्रस्ताव
नेपाल पुलिस के प्रवक्ता अभिनारायण काफ्ले ने मीडिया को जानकारी देते हुए बताया कि पुलिस विभाग की नई रणनीतिक योजना में कॉल इंटरसेप्शन के अधिकार को भी शामिल किया गया है। उन्होंने साफ तौर पर कहा कि गंभीर अपराधों में शामिल लोग या कानून की नजरों से बचकर भाग रहे फरार आरोपियों की गतिविधियों का पता लगाने के लिए उनके संपर्कों की निगरानी करना बहुत जरूरी हो गया है। पुलिस चाहती है कि जांच प्रक्रिया को पूरी तरह से तकनीक के अनुकूल और असरदार बनाया जाए ताकि अपराधियों के छुपने के सारे रास्ते बंद किए जा सकें।
प्रवक्ता अभिनारायण काफ्ले ने आगे बताया कि जो लोग जघन्य अपराधों में संलिप्त हैं और पुलिस की पकड़ से बाहर चल रहे हैं, वे फोन पर किससे बात कर रहे हैं और क्या साजिश रच रहे हैं, यह सुनना जांच अधिकारियों के लिए बेहद अहम हो जाता है। इसी बात को ध्यान में रखते हुए पुलिस ने अपनी पूरी रणनीतिक योजना का प्रस्ताव तैयार करके देश के गृह मंत्रालय के पास मंजूरी के लिए भेज दिया है। मंत्रालय के फैसले के बाद ही तय होगा कि इस दिशा में आगे क्या कदम उठाए जाएंगे।
पुराना है फोन टैपिंग और निगरानी का विवाद
आपको बता दें कि नेपाल में फोन इंटरसेप्शन या बातचीत की निगरानी का अधिकार देने का मामला कोई नया नहीं है। इससे पहले भी देश की प्रमुख खुफिया एजेंसी राष्ट्रीय अनुसंधान विभाग को ऐसा ही अधिकार देने की कोशिशें की जा चुकी हैं। तत्कालीन प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली के कार्यकाल के दौरान वर्ष 2019 में राष्ट्रीय सभा में नेपाल विशेष सेवा विधेयक पेश किया गया था जिसमें पहली बार इस तरह का प्रावधान जोड़ा गया था। इसके बाद वर्ष 2020 में राष्ट्रीय सभा ने इस विधेयक को पास करके आगे की प्रक्रिया के लिए प्रतिनिधि सभा में भेज दिया था।
हालांकि, उस समय आम नागरिकों की निजता और गोपनीयता के अधिकार के खुले उल्लंघन की आशंका जताई गई थी जिसके कारण इस कानून का देश भर में कड़ा विरोध हुआ था। जनता और विपक्षी दलों के भारी विरोध के दबाव के चलते उस विधेयक को आगे नहीं बढ़ाया जा सका और मामला ठंडे बस्ते में चला गया। इसके बाद फिर से वर्ष 2025 में ओली सरकार के कार्यकाल के दौरान एक नया विधेयक लाने का प्रयास किया गया जिसमें नागरिकों के फोन कॉल, मैसेज, वीडियो और अन्य सभी प्रकार की डिजिटल सामग्री की निगरानी करने की अनुमति देने का प्रावधान रखा गया था।
क्या थे नए विधेयक के नियम और शर्तें
उस समय तैयार किए गए विधेयक के मसौदे में यह नियम तय किया गया था कि यदि किसी अन्य पारंपरिक तरीके से जरूरी सूचना जुटाना संभव न हो और तुरंत जानकारी न मिलने की स्थिति में देश की सुरक्षा को बड़ा नुकसान पहुंचने का खतरा हो, तो संबंधित पुलिस महानिरीक्षक की संतुष्टि के आधार पर किसी भी संदिग्ध व्यक्ति या संस्था की फोन बातचीत की निगरानी की जा सकेगी। मसौदे के नियमों के मुताबिक संचार माध्यमों या अन्य माध्यमों से होने वाली सभी प्रकार की बातचीत, ऑडियो और वीडियो सामग्री, इलेक्ट्रॉनिक संकेतों या विवरणों की पूरी निगरानी और इंटरसेप्शन किया जा सकता था। इसके लिए संबंधित महानिरीक्षक के सीधे निर्देशन में अधीनस्थ अधिकारियों को लिखित आदेश जारी करने का अधिकार भी मिलने वाला था।
अब एक बार फिर से नेपाल पुलिस द्वारा खुद ही अपराध अनुसंधान के वास्ते कॉल इंटरसेप्शन का अधिकार मांगे जाने के बाद देश में आम लोगों के मौलिक अधिकारों, उनकी निजता और पुलिस जांच की जरूरतों के बीच तालमेल बिठाने का मुद्दा गर्माने लगा है। इस नए कदम के सामने आने के बाद से ही कानूनी विशेषज्ञों और आम जनता के बीच चर्चा शुरू हो गई है कि क्या इससे अपराधों पर लगाम लगेगी या फिर नागरिकों की पर्सनल प्राइवेसी पर आंच आएगी।