नेपाल में महर्षि वाल्मीकि के तपोभूमि तक पहुंचना आज भी है मुश्किल, जानिए रामायण काल से जुड़े इस पवित्र स्थल का पूरा इतिहास.

Nura Basta10 August 20263 min read93 viewsIndia
नेपाल में महर्षि वाल्मीकि के तपोभूमि तक पहुंचना आज भी है मुश्किल, जानिए रामायण काल से जुड़े इस पवित्र स्थल का पूरा इतिहास.

बिहार के पश्चिम चंपारण से सटे नेपाल के चितवन जिले में स्थित भगवान राम और रामायण काल से जुड़े ऐतिहासिक और धार्मिक स्थल वाल्मीकि आश्रम तक पहुंचना आज के समय में भी आम लोगों के लिए बहुत आसान नहीं है। इस जगह को महर्षि वाल्मीकि की तपोभूमि माना जाता है और हिंदू धर्म में इसका बहुत बड़ा महत्व है। रामायण की कथा के अनुसार, माता सीता को अग्निपरीक्षा के बाद यहीं वनवास में भेजा गया था और इसी पावन भूमि पर लव तथा कुश का जन्म हुआ था। यहीं पर उन्होंने अपना बचपन बिताया और महर्षि वाल्मीकि से अपनी शिक्षा-दीक्षा पूरी की थी।

रामायण काल से जुड़ी हैं इस पवित्र स्थल की कई ऐतिहासिक यादें

धार्मिक मान्यताओं और रामायण की कथा के मुताबिक, जब भगवान राम ने अयोध्या में अश्वमेध यज्ञ का आयोजन किया था, तब यज्ञ के दौरान छोड़ा गया घोड़ा बाल्यावस्था में ही लव और कुश ने पकड़कर इसी जगह पर रोक लिया था। इस बात का जिक्र कई धार्मिक ग्रंथों में मिलता है। आज से कई साल पहले 1964 में उत्तर प्रदेश के प्रयागराज (तब इलाहाबाद) में एक धर्म संसद का आयोजन किया गया था। उस धर्म संसद में यह बड़ा निर्णय लिया गया था कि जिस जगह पर महर्षि वाल्मीकि ने पवित्र रामायण की रचना की थी और माता सीता के त्यागे जाने के बाद लव-कुश का जन्म हुआ था, वह तमसा नदी के किनारे बसा वाल्मीकि आश्रम नेपाल की सीमा के भीतर ही आता है। इसके बाद भारत सरकार ने भी गंडक बैराज की डीपीआर में संशोधन किया और इस ऐतिहासिक वाल्मीकि आश्रम को नेपाल की सीमा के अंदर ही दर्शाया था।

GulfHindi की हर खबर सबसे पहलेJoin

मंदिर के अंदर स्थापित है भगवान हरिहर की दुर्लभ अष्टधातु मूर्ति

भगवान राम और माता सीता से जुड़ा होने के कारण देश-विदेश के हिंदू श्रद्धालु इस जगह को एक बहुत महत्वपूर्ण तीर्थस्थल मानते हैं। इस आश्रम परिसर के भीतर राम, सीता, महर्षि वाल्मीकि, लव-कुश और हरिहर की मूर्तियों के साथ कई सुंदर मंदिर बनाए गए हैं। यहां के मुख्य मंदिर में स्थापित भगवान हरिहर की अष्टधातु की मूर्ति को विशेष रूप से महत्वपूर्ण माना जाता है। मंदिर के पुजारी रामशरण गिरी के अनुसार, नेपाल के राजा महेन्द्र ने विक्रम संवत 2022 में इस आश्रम में खुदाई करवाते समय इस मूर्ति को प्राप्त किया था। इसके बाद विक्रम संवत 2028 में तत्कालीन सरकार ने हरिहर की इसी मूर्ति की तस्वीर वाला एक विशेष डाक टिकट भी जारी किया था। पुजारी गिरी ने यह भी बताया कि राजा महेंद्र ने ही इस जगह पर एक आकर्षक मंदिर का निर्माण करवाया था, मूर्ति की स्थापना कराई थी और यहां पूजा-पाठ के लिए पुजारियों की व्यवस्था करने के साथ-साथ कुछ परिवारों को लाकर यहां बसाया था। आज भी इस सुनसान और सुंदर आश्रम परिसर के भीतर 14 परिवार स्थायी रूप से रह रहे हैं।

पुल बनने के बाद भी पर्यटकों को होती है आने-जाने में परेशानी

इतनी प्राचीन और धार्मिक धरोहर होने के बावजूद तथा यहां एक दर्जन से अधिक परिवारों के रहने के बाद भी इस आश्रम तक पहुंचना पर्यटकों के लिए काफी कठिन काम है। यह पूरा वाल्मीकि आश्रम भौगोलिक रूप से चितवन के माड़ी क्षेत्र के अंतर्गत आता है, लेकिन यह पूर्वी नवलपरासी के त्रिवेणी इलाके से बहुत अधिक नजदीक पड़ता है। त्रिवेणी में नारायणी नदी को पार करने के बाद लगभग ढाई किलोमीटर की पैदल या सड़क की दूरी तय करके इस आश्रम तक पहुंचा जा सकता है। एक बहुत बड़ा और महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल होने के बावजूद लंबे समय तक सही और पक्का मार्ग न होने की वजह से यह पूरा इलाका उपेक्षित सा रहा है। इसी बड़ी समस्या को दूर करने के लिए सरकार ने करीब चार वर्ष पहले नारायणी नदी के ऊपर एक नए पुल का निर्माण करवाया था। हर साल नए साल के मौके पर, माघ संक्रांति से लेकर माघ अमावस्या तक, महाशिवरात्रि और बड़ी एकादशी जैसे तमाम बड़े पर्वों के अवसर पर देश और दुनिया से बड़ी संख्या में पर्यटक और श्रद्धालु इस वाल्मीकि आश्रम तक पहुंचना चाहते हैं। इस खबर से जुड़ी विस्तृत जानकारी आप हिन्दुस्थान समाचार की वेबसाइट पर देख सकते हैं।

Share:

Comments

Leave a comment