भारत समेत कई देशों की रूस के आर्कटिक रूट में बढ़ी दिलचस्पी, पुतिन ने किया बड़ा खुलासा

रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने गुरुवार को एक बड़ा बयान देते हुए कहा कि भारत और चीन समेत दुनिया के कई देश उनके देश के नॉर्दर्न सी रूट (एनसीआर) के विकास में बहुत रुचि दिखा रहे हैं। रूस इन दिनों पश्चिमी देशों के कड़े प्रतिबंधों का सामना कर रहा है, जिसके बाद एशिया के बड़े देशों के साथ व्यापार और परिवहन के रास्ते मजबूत करने पर जोर दिया जा रहा है। पुतिन का यह ताजा बयान रूस के सुदूर पूर्व और सखालिन क्षेत्र के दौरे के दौरान सामने आया है, जहां वह नौसैनिक अभ्यास की निगरानी कर रहे थे। उन्होंने पैसिफिक फ्लीट के कर्मियों से बातचीत के दौरान इस अहम समुद्री रास्ते पर आपसी सहयोग का जिक्र किया। रूस की अंतरराष्ट्रीय समाचार टेलीविजन नेटवर्क रशिया टुडे (आरटी) के अनुसार, भारत और इस प्रोजेक्ट को लेकर लगातार बातचीत जारी है।
आर्कटिक रूट का रणनीतिक महत्व और वैकल्पिक मार्ग
यह नॉर्दर्न सी रूट रूस के उत्तरी तट के साथ आर्कटिक महासागर से होकर निकलता है और एशिया तथा यूरोप के बीच समुद्री व्यापार के लिए एक बहुत बड़ा वैकल्पिक रास्ता बन सकता है। रूस इस रास्ते को बेहतर बनाने के लिए भारी निवेश कर रहा है ताकि इसे अंतरराष्ट्रीय शिपिंग के लिए मुख्य मार्ग बनाया जा सके। भारत जैसे देश के लिए यह रूट यूरोप के उत्तरी और पूर्वी बाजारों तक पहुंचने का एक नया जरिया बन सकता है। मध्य पूर्व के देशों में लगातार चल रहे संघर्षों की वजह से पारंपरिक स्वेज नहर मार्ग पर खतरा बढ़ गया है, जिससे इस आर्कटिक रूट की अहमियत और भी ज्यादा बढ़ गई है। भारत और रूस के बीच पहले से ही चेन्नई-व्लादिवोस्तोक समुद्री गलियारा चालू है और अब आर्कटिक क्षेत्र में भी मिलकर काम करने पर जोर दिया जा रहा है। दोनों देशों का लक्ष्य आपसी व्यापार को 100 अरब डॉलर तक ले जाने का है, जिसके लिए लॉजिस्टिक्स के नए विकल्पों पर तेजी से काम चल रहा है।
भारत और रूस के बीच समझौते की तैयारी
पिछले महीने ही रूसी प्रधानमंत्री मिखाइल मिशुस्टिन ने देश की सरकारी परमाणु ऊर्जा कंपनी रोसाटॉम को यह निर्देश दिया था कि वह आर्कटिक रूट पर समुद्री माल ढुलाई को लेकर भारत के साथ एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर करे। यह कंपनी नॉर्दर्न सी रूट की आधिकारिक ऑपरेटर और समन्वयक है। रोसाटॉम रूस के परमाणु ऊर्जा से चलने वाले आइसब्रेकर बेड़े का भी पूरा ध्यान रखती है। ये खास जहाज आर्कटिक की भारी बर्फ के बीच समुद्री रास्ते को साफ रखते हैं ताकि जहाज आसानी से आ-जा सकें। रूसी अधिकारियों ने यह भी बताया कि भारत और रूस मिलकर आइस-क्लास जहाजों और कंटेनर शिपिंग के विकास पर बात कर रहे हैं। भारत के बड़े शिपयार्ड आर्कटिक की मुश्किल परिस्थितियों में काम करने वाले गैर-परमाणु आइसब्रेकर बनाने की संभावनाओं पर भी विचार कर रहे हैं। रूस का मानना है कि भारत के शामिल होने से इस रास्ते पर व्यापार और तेजी से आगे बढ़ेगा, वहीं भारत को भी रूस के सुदूर पूर्व और यूरोपीय बाजारों तक पहुंचने का बड़ा मौका मिलेगा।