रोहिंग्या संकट के नौ साल पूरे, दुनिया भर में न्याय की मांग और गहराता मानवीय संकट.

म्यांमार में हुए सैन्य क्रूरता के 9 साल पूरे हो चुके हैं और इस दिन को दुनिया भर में रोहिंग्या मुसलमानों के लिए इंसाफ और जवाबदेही की मांग के रूप में याद किया गया। आज भी बांग्लादेश के कॉक्स बाजार के शरणार्थी शिविरों में 1.2 मिलियन से अधिक रोहिंग्या शरणार्थी बहुत ही मुश्किल हालात में रह रहे हैं। दुनिया भर के मानवाधिकार संगठन और संयुक्त राष्ट्र इस संकट को दुनिया का सबसे बड़ा विस्थापन और अत्याचार मान रहे हैं, जहां बेकसूर लोग बिना किसी देश के नागरिक बने जीने को मजबूर हैं।
संयुक्त राष्ट्र और नागरिक संगठनों की अपील
संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने दुनिया के सभी देशों से अपील की है कि वे शरणार्थियों की सुरक्षा और उनके लिए कम होती मदद को बढ़ाने के लिए तुरंत ठोस कदम उठाएं। इसके साथ ही ब्लड मनी कैंपेन, डिफेंड म्यांमार डेमोक्रेसी और प्रोग्रेसिव वॉइस जैसे कई नागरिक संगठनों ने मिलकर एक साझा बयान जारी किया। इस बयान में मांग की गई है कि रोहिंग्या लोगों को तुरंत कानूनी सहायता और उनके देश में पूरे नागरिक अधिकार मिलने चाहिए। इसी बीच, मानवीय सेवा के लिए Mae Tao Clinic को 13वें ओकिनावा शांति पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
फंड की भारी कमी और भुखमरी का खतरा
इस गंभीर संकट के बाद भी शरणार्थियों के लिए मिलने वाले पैसों और फंड में बहुत कमी आ गई है। साल 2026 के लिए कुल $710 मिलियन का बजट मांगा गया था, लेकिन इसका केवल 66 प्रतिशत हिस्सा ही मिल पाया है। फंड की इस भारी कमी की वजह से विश्व खाद्य कार्यक्रम (WFP) को मजबूरन खाने की मदद में कटौती करनी पड़ी है और अब प्रति व्यक्ति को महीने में केवल $7 की मदद मिल पा रही है। इस आर्थिक तंगी के कारण शरणार्थी शिविरों में रहने वाले कुल लोगों में से 35 प्रतिशत लोग गंभीर भुखमरी के दौर से गुजर रहे हैं। इसके अलावा, शरणार्थियों में कुल आबादी का 52 प्रतिशत हिस्सा केवल बच्चों का है, जिसमें 235,000 से ज्यादा ऐसे बच्चे शामिल हैं जिनकी उम्र 5 से 17 साल के बीच है और वे स्कूल नहीं जा पा रहे हैं।
म्यांमार लौटने के हालात अभी सुरक्षित नहीं
दुनिया भर के 16 देशों के राजनयिकों, जिनमें ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा और यूरोपीय संघ शामिल हैं, ने एक संयुक्त बयान में साफ किया है कि म्यांमार के रखाइन राज्य में हालात अभी भी बहुत खराब हैं। वहां लगातार हवाई हमले हो रहे हैं और राहत सामग्री को रोका जा रहा है, जिसकी वजह से शरणार्थियों की स्वेच्छा से वापसी के लिए माहौल बिल्कुल सुरक्षित नहीं है। म्यांमार की सैन्य समर्थित सरकार का दावा है कि उसने बांग्लादेश द्वारा भेजे गए 820,000 लोगों की सूची में से 308,000 नामों की जांच कर ली है, लेकिन जानकारों का मानना है कि साल 2017 के बाद से आज शरणार्थियों की सुरक्षित वापसी सबसे ज्यादा दूर नजर आ रही है। इस पूरी स्थिति को और ज्यादा पेचीदा बना दिया है साल 2024 की शुरुआत से अब तक आए 150,000 नए शरणार्थियों ने और म्यांमार की सेना तथा अराकन आर्मी के बीच चल रही लगातार हिंसा ने। इस पूरी स्थिति के बारे में अधिक जानकारी के लिए आप ReliefWeb UNHCR Update और Oxfam International Report पर जा सकते हैं।