बांग्लादेश के कॉक्स बाजार में रोहिंग्या शरणार्थियों का बड़ा प्रदर्शन, सुरक्षित वापसी की मांग की

बांग्लादेश के कॉक्स बाजार शिविरों में रहने वाले रोहिंग्या शरणार्थियों ने म्यांमार की सेना द्वारा किए गए क्रूरतापूर्ण सैन्य अभियान की नौवीं बरसी पर बहुत बड़ा विरोध प्रदर्शन किया है। इस दौरान हजारों की संख्या में शरणार्थी सड़कों पर उतरे और अपने वतन यानी सुरक्षित घर वापसी की मांग को लेकर आवाज उठाई। इस शांतिपूर्ण प्रदर्शन का आयोजन यूनाइटेड काउंसिल ऑफ रोहिंग्या (UCR) द्वारा किया गया था, जिसमें लोगों ने अपनी बेहद खराब जिंदगी और लगातार जारी मानवीय संकट के बारे में खुलकर बात की।
दुनिया की सबसे बड़ी शरणार्थी बस्ती का हाल
वर्तमान समय में 1.2 मिलियन से अधिक रोहिंग्या शरणार्थी बांग्लादेश के कॉक्स बाजार में बने लगभग 30 शिविरों में जीवन बिता रहे हैं। यह दुनिया की सबसे बड़ी शरणार्थी बस्ती मानी जाती है, जहां कुल आबादी के आधे से ज्यादा लोग सिर्फ छोटे बच्चे हैं। शिविरों में रहने वाले लोगों का कहना है कि विश्व खाद्य कार्यक्रम और अन्य स्वास्थ्य सेवाओं से मिलने वाली जरूरी मानवीय मदद अब जरूरत के हिसाब से बहुत कम हो गई है। फंड की कमी और राशन घटने की वजह से हालात और भी ज्यादा खराब हो गए हैं।
बच्चों के भविष्य को लेकर गहरी चिंता
सेव द चिल्ड्रेन संस्था ने अपनी रिपोर्ट में आशंका जताई है कि सितंबर से दिसंबर के बीच हर तीसरा शरणार्थी गंभीर भूखमरी का सामना करेगा। शिविरों में इस संस्था के प्रमुख गोलम मुस्तफा ने युवा शरणार्थियों के सामने आ रहे अनिश्चित भविष्य और भुखमरी को लेकर गहरी चिंता व्यक्त की है। उन्होंने चेतावनी दी है कि पूरी एक पीढ़ी बिना किसी पक्के समाधान के देश से बाहर ही बड़ी हो रही है। बच्चों के पास पढ़ाई-लिखाई का कोई औपचारिक साधन नहीं है, जिससे उनका भविष्य पूरी तरह अंधकार में नजर आ रहा है।
अंतरराष्ट्रीय कूटनीति और म्यांमार के हालात
इस बीच, ब्रिटिश उच्च आयोग समेत बांग्लादेश में मौजूद कई देशों के राजनायिक मिशनों ने 25 अगस्त 2026 को एक संयुक्त बयान जारी किया। इस बयान में शरणार्थियों के वतन लौटने के अधिकार का समर्थन तो किया गया, लेकिन यह भी साफ कर दिया गया कि म्यांमार के रखाइन राज्य में लगातार बढ़ रहा संघर्ष, हवाई हमले और व्यापार पर रोक के कारण अभी वहां जाना बिल्कुल सुरक्षित नहीं है। म्यांमार की सैन्य समर्थित सरकार ने यह कहा था कि सुरक्षा ठीक होने के बाद वे 300,000 से अधिक शरणार्थियों को वापस ले लेंगे। हालांकि, बांग्लादेश ने इन आंकड़ों को खारिज कर दिया है और म्यांमार द्वारा रोहिंग्या शब्द न मानकर उन्हें बंगाली कहे जाने पर कड़ी आपत्ति जताई है।
अदालत में मामला और समुद्र के रास्ते पलायन का खतरा
साल 2017 की उस सैन्य कार्रवाई के खिलाफ द हेग स्थित अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में नरसंहार का मामला अभी भी चल रहा है, जिसकी सुनवाई जनवरी 2026 में हुई थी और फैसले का इंतजार किया जा रहा है। म्यांमार आज भी उस अभियान को आतंकवाद के खिलाफ एक कार्रवाई बताता है। इन सभी खतरों के बावजूद लोग जान जोखिम में डालकर समुद्री यात्रा कर रहे हैं। साल 2025 समंदर के रास्ते पलायन के लिए सबसे खतरनाक साल साबित हुआ था और जुलाई 2026 में दो अलग-अलग नाव डूबने की घटनाओं में 500 से ज्यादा लोगों के मारे जाने की आशंका जताई गई है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय पर रखाइन राज्य की सुरक्षा और शिक्षा को लेकर लगातार दबाव बढ़ता जा रहा है।