ईरान और अमेरिका के बीच जारी तनाव के 6 महीने, ट्रंप के बदले सुर पर दुनिया की नजर

अमेरिका और ईरान के बीच चल रहा तनाव अब छठे महीने में प्रवेश कर गया है, जिससे पूरे खाड़ी क्षेत्र में बेचैनी का माहौल बना हुआ है। अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने पिछले कुछ समय में अपने रुख को कई बार बदला है, कभी सख्त धमकियां दी हैं तो कभी सुलह के संकेत दिए हैं। इस संघर्ष की शुरुआत कथित तौर पर फरवरी 2026 में हुई थी, जब एक सैन्य योजना के तहत ईरान के नेतृत्व और उनके परमाणु कार्यक्रम को निशाना बनाने की कोशिश की गई थी।
तनाव और बातचीत का सिलसिला
शुरुआती दौर में बेंजामिन नेतन्याहू और मोसाद प्रमुख David Barnea द्वारा पेश की गई एक 'डिकैपिटेशन स्ट्राइक' की योजना थी, जिसका उद्देश्य ईरान में सत्ता परिवर्तन करना था। हालांकि, यह योजना उम्मीद के मुताबिक सफल नहीं हो सकी। हाल ही में, राष्ट्रपति ट्रंप ने यह दावा किया कि उन्होंने ईरान पर और हमले की योजना को फिलहाल रोक दिया है। उन्होंने ईरान और अन्य मध्य-पूर्वी देशों के अनुरोध का हवाला देते हुए कहा कि वे एक समझौते के करीब पहुंच रहे हैं। उनका कहना है कि हॉर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) और ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर एक डील संभव है।
ईरान का क्या है कहना
ईरान के विदेश मंत्रालय ने वाशिंगटन के साथ किसी भी व्यापक समझौते की बात को सिरे से खारिज किया है। हालांकि, मंत्रालय ने यह माना है कि ओमान के साथ उनकी बातचीत सकारात्मक दिशा में चल रही है और जल्द ही किसी नतीजे पर पहुंचने की उम्मीद है। इस पूरे घटनाक्रम में अमेरिका ने अब अपनी गतिविधियों से जुड़ी जानकारी को जनता के सामने कम कर दिया है, जबकि युद्ध का बढ़ता हुआ खर्च अब एक बड़ी चिंता का विषय बनता जा रहा है।
क्षेत्रीय असर और कारोबार पर चोट
इस युद्ध का असर अब पूरे इलाके में महसूस किया जा रहा है। हाल ही में यमन के Houthi विद्रोहियों ने सऊदी अरब के एक हवाई अड्डे पर ड्रोन हमला करने का दावा किया है, जिसे ईरान का समर्थन प्राप्त है। एक तरफ जहां युद्ध की वजह से सुरक्षा को लेकर आम लोगों और प्रवासियों में डर है, वहीं दूसरी तरफ तेल कंपनियों ने इस अस्थिरता के बीच रिकॉर्ड मुनाफा दर्ज किया है। खाड़ी देशों में काम करने वाले लाखों भारतीय और अन्य प्रवासी इस स्थिति पर बारीकी से नजर बनाए हुए हैं, क्योंकि क्षेत्र में किसी भी तरह की अशांति का सीधा असर वहां के जनजीवन और रोजगार पर पड़ता है। बाजार में चल रही अस्थिरता और तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव सीधे तौर पर आम आदमी की जेब और खर्चों को प्रभावित करते हैं।