Strait of Hormuz: तुर्की के राष्ट्रपति एर्दोगान ने स्ट्रेट ऑफ हार्मुज को जल्द खोलने की मांग की, वैश्विक व्यापार पर मंडरा रहा है बड़ा खतरा।

तुर्की के राष्ट्रपति Recep Tayyip Erdogan ने वैश्विक व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति को बचाने के लिए बेहद अहम माने जाने वाले Strait of Hormuz को तुरंत दोबारा खोलने की पुरजोर मांग की है। Al Jazeera को दिए गए एक इंटरव्यू में उन्होंने साफ तौर पर कहा कि इस महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग के लगातार बंद रहने से दुनिया भर के देशों को भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है और इसका फायदा किसी भी देश को नहीं मिल रहा है। उन्होंने क्षेत्रीय तनाव को कम करने के लिए कतर की मध्यस्थता की भूमिका की भी सराहना की ताकि इस गंभीर समस्या का कोई ठोस समाधान निकाला जा सके और समुद्री जहाजों की आवाजाही को फिर से सुचारू रूप से शुरू किया जा सके।
अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ रहा है तनाव
मौजूदा समय में हालात काफी ज्यादा तनावपूर्ण बने हुए हैं क्योंकि अमेरिका और ईरान दोनों ही इस समुद्री मार्ग को लेकर लगातार एक-दूसरे को धमकियां दे रहे हैं। ईरान के उप विदेश मंत्री Kazem Gharibabadi ने दोहराया है कि यह जलडमरूमध्य पूरी तरह से ईरानी नियंत्रण में है। उनका कहना है कि जब तक अमेरिका अपने लगाए गए प्रतिबंधों को पूरी तरह से हटा नहीं लेता, नौसैनिक गतिविधियों को बंद नहीं करता और हुए नुकसान का मुआवजा नहीं देता, तब तक यह नाकाबंदी ऐसे ही जारी रहेगी। यह बयान अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump की उस टिप्पणी के बाद सामने आया है जिसमें उन्होंने ईरान की सामरिक हार का दावा करते हुए इस जलमार्ग को जल्द ही अमेरिकी क्षेत्र घोषित करने की बात कही थी।
वैश्विक व्यापार और भारत पर पड़ा असर
इस रास्ते के बंद होने की वजह से अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर बहुत बुरा असर पड़ा है और ईरान के गैर-तेल व्यापार में 30% की भारी गिरावट दर्ज की गई है। चीन, भारत और यूरोपीय संघ जैसे प्रमुख वैश्विक साझेदारों के साथ जरूरी सामानों की सप्लाई चेन बुरी तरह से प्रभावित हुई है। इस स्थिति का असर भारत पर भी साफ दिखाई दे रहा है क्योंकि भारत ने इस क्षेत्र में दवाइयों के लिए जरूरी कच्चे माल की शिपमेंट को फिलहाल रोक दिया है। भारतीय जहाजों के लिए सुरक्षित रास्ते की बहाली के बाद ही इस सप्लाई को दोबारा शुरू किया जाएगा। इस बारे में अधिक जानकारी के लिए आप WAM News की रिपोर्ट देख सकते हैं। दोनों पक्षों के बीच किसी समझौते पर सहमति न बन पाने के कारण इस रास्ते पर जहाजों की आवाजाही ऐतिहासिक रूप से सबसे निचले स्तर पर पहुंच गई है और पूरी दुनिया की नजरें इस पर टिकी हुई हैं।