US Tariffs: अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप की टैरिफ नीति के खिलाफ 25 राज्य एकजुट, यूएस कोर्ट ऑफ इंटरनेशनल ट्रेड पहुंचे

अमेरिका में राजनीतिक हलचल उस समय तेज हो गई जब डेमोक्रेटिक पार्टी शासित 25 राज्यों ने राष्ट्रपति Donald Trump की नई टैरिफ नीति के खिलाफ कड़ा मोर्चा खोल दिया। इन सभी राज्यों ने मिलकर यूएस कोर्ट ऑफ इंटरनेशनल ट्रेड में ट्रंप प्रशासन के खिलाफ एक बड़ा मुकदमा दायर कर दिया है। अमेरिकी समयानुसार सोमवार को इस कानूनी लड़ाई के संबंध में न्यूयॉर्क की अटॉर्नी जनरल Letitia James ने गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि ट्रंप प्रशासन पूरी तरह से अवैध रूप से आम परिवारों और छोटे-बड़े व्यवसायों पर टैक्स का बोझ लगातार बढ़ा रहा है।
टैरिफ को लेकर क्या है ट्रंप प्रशासन का तर्क
राष्ट्रपति Donald Trump का यह साफ तर्क है कि ऊंचे टैरिफ लगाने से अमेरिकी विनिर्माण यानी मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को फिर से पुनर्जीवित करने में बहुत मदद मिलेगी। इस नीति को लागू करने के लिए उन्होंने साल 1977 के इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनॉमिक पावर्स एक्ट यानी IEEPA का हवाला दिया था। उन्होंने देश के व्यापार घाटे को एक बड़ा राष्ट्रीय आपातकाल बताते हुए दुनिया के लगभग हर देश से होने वाले आयात पर भारी-भरकम टैरिफ लगा दिए थे। अमेरिकी न्यूज वेबसाइट Politico की रिपोर्ट के अनुसार, इन सभी राज्यों का मुख्य आरोप यह है कि यह नया टैरिफ असल में फरवरी महीने में सुप्रीम कोर्ट द्वारा रद्द किए गए पुराने आयात करों को किसी तरह बदलने का सिर्फ एक बहाना मात्र है।
पुराने फैसलों और राजस्व की भरपाई की कोशिश
बीते महीने यानी जुलाई में अमेरिका ने कुल 59 देशों और यूरोपीय संघ पर दोहरे अंक वाले भारी टैरिफ थोप दिए थे। ये सारे टैरिफ जबरन श्रम यानी फोर्सड लेबर से उत्पादित आयातित सामानों पर पर्याप्त कार्रवाई न करने के गंभीर आरोपों के तहत लगाए गए थे। दरअसल, अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक स्पष्ट फैसले में यह सुनाया था कि IEEPA कानून टैरिफ लगाने की अनुमति नहीं देता है। इस अदालत के फैसले के बाद प्रशासन की यह मजबूरी बन गई थी कि उसे उन सभी आयातकों का पैसा वापस करना पड़े जिन्होंने पहले इन टैरिफ का भुगतान किया था। इसके बाद अपने राजस्व की भारी भरकम भरपाई करने के लिए ट्रंप ने एक अस्थायी 10 फीसदी वैश्विक टैरिफ लागू किया था, जिसकी समयसीमा बीते 24 जुलाई को पूरी तरह समाप्त हो गई।
नए ट्रेड एक्ट और दरों का विवरण
अब इस समयासीमा के खत्म होने के बाद राष्ट्रपति ट्रंप साल 1974 के ट्रेड एक्ट की धारा 301 का इस्तेमाल करके और अधिक स्थायी टैरिफ लगा रहे हैं। यह खास धारा अमेरिकी राष्ट्रपति को उन देशों के खिलाफ आयात कर लगाने की पूरी अनुमति देती है जो किसी भी प्रकार की अनुचित व्यापार प्रथाओं में शामिल पाए जाते हैं। याद दिला दें कि ट्रंप ने अपने पिछले कार्यकाल के दौरान चीन पर बड़े टैरिफ लगाने के लिए इसी धारा 301 का खुलकर इस्तेमाल किया था और उस समय वे अदालती चुनौतियों में पूरी तरह टिके रहे थे। ट्रंप प्रशासन द्वारा तय किया गया यह नया टैरिफ 10 फीसदी से 12.5 फीसदी के बीच है। यह नया नियम उन सभी देशों को सीधे तौर पर प्रभावित करता है जो अकेले अमेरिकी आयात का कुल 99 फीसदी हिस्सा प्रदान करते हैं। इस पूरे मामले पर अपनी बात रखते हुए व्हाइट हाउस के प्रवक्ता Kush Desai ने कहा कि अमेरिका अपने सभी वैध अधिकारों का सही उपयोग कर रहा है। उन्होंने आगे कहा कि जबरन श्रम वाले सामानों के आयात पर प्रतिबंध के नियमों को सख्ती से लागू न करना पूरी तरह अनुचित है और इससे अमेरिकी कारोबार पर बहुत बड़ा बोझ पड़ता है।
कैलिफोर्निया के अटॉर्नी जनरल का तीखा बयान
कैलिफोर्निया के अटॉर्नी जनरल Rob Bonta ने इस मुकदमे को आधिकारिक तौर पर दर्ज कराने की घोषणा करते हुए तीखे शब्दों में कहा कि राष्ट्रपति ट्रंप आम अमेरिकियों के लिए जीवनयापन की लागत को जानबूझकर बढ़ाने पर इतने ज्यादा आमादा हो चुके हैं कि वे ऐसा करने के लिए एक के बाद एक कानूनों को तोड़ने को पूरी तरह तैयार बैठे हैं। यह ध्यान देने योग्य है कि रॉब बोंटा का राज्य भी मुकदमा करने वाले उन 25 राज्यों में प्रमुख रूप से शामिल है। बोंटा ने अपनी बात को स्पष्ट करते हुए कहा कि टैरिफ सीधे तौर पर एक प्रकार के टैक्स होते हैं और अमेरिकी आम लोग राष्ट्रपति की इस पूरी तरह विफल और गैरकानूनी आर्थिक नीति की वजह से आने वाले किसी भी अतिरिक्त खर्च का भारी बोझ उठाने के लिए बिल्कुल भी तैयार नहीं हैं और न ही उन्हें ऐसा करना चाहिए।