Russia Oil Import: अमेरिका का बड़ा एक्शन, रूस से तेल खरीदने वाले भारत समेत 5 देशों पर लग सकता है 100 प्रतिशत टैरिफ

रूस से तेल और गैस खरीदने वाले देशों पर अमेरिका ने दबाव बढ़ाने की तैयारी पूरी तरह से तेज कर दी है। अमेरिकी सीनेट ने लिंडसे ओ. ग्राहम सैंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट ऑफ 2026 को 86-11 के भारी बहुमत से मंजूरी दे दी है। इस नए प्रस्तावित कानून के तहत रूस से ऊर्जा की खरीद जारी रखने वाले भारत, चीन, स्लोवाकिया, हंगरी और अज़रबैजान से होने वाले अमेरिकी आयात पर 100 प्रतिशत तक अतिरिक्त टैरिफ लगाने का रास्ता खुल गया है। हालांकि, यह टैरिफ अभी तुरंत लागू नहीं हुआ है और इस बिल को कानून बनने के लिए आगे की विधाई प्रक्रिया से गुजरना होगा। ब्रिटिश दैनिक समाचार पत्र 'द गार्डियन' व अन्य मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, भारत इस संभावित कानून के दायरे में आने वाले प्रमुख देशों में शामिल है, क्योंकि साल 2022 के बाद से भारत लगातार रूसी कच्चे तेल का सबसे बड़ा खरीदार बना हुआ है।
यूक्रेन युद्ध के बाद भारत ने बढ़ाई थी तेल की खरीद
यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद पश्चिमी देशों ने रूसी ऊर्जा के आयात पर कड़े प्रतिबंध लगा दिए थे। इन प्रतिबंधों के बीच भारत ने अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए रूस से सस्ता कच्चा तेल खरीदना काफी ज्यादा बढ़ा दिया था। इस फैसले से भारतीय रिफाइनरियों को बहुत कम कीमत पर कच्चा तेल मिल गया, जिससे देश की घरेलू ऊर्जा आपूर्ति को सुचारू रूप से संभालने में बहुत बड़ी मदद मिली। लेकिन अब इसी तेल खरीद की वजह से भारत अमेरिकी प्रशासन के प्रतिबंधों के संभावित दायरे में आ गया है। इस नए प्रस्तावित कानून के तहत यदि अमेरिकी राष्ट्रपति इस प्रावधान का इस्तेमाल करते हैं, तो रूस से ऊर्जा खरीदने वाले इन प्रमुख देशों से अमेरिका में आने वाले सभी सामानों पर 100 प्रतिशत तक का अतिरिक्त शुल्क लगाया जा सकता है। इसका सीधा और बड़ा असर भारत के उन निर्यातकों पर पड़ सकता है जो अमेरिका में अपने उत्पाद भेजते हैं। अमेरिकी बाजार में भारतीय उत्पाद बहुत महंगे हो जाएंगे, जिससे उनकी प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता काफी कमजोर हो सकती है और भारत-अमेरिका के व्यापारिक रिश्तों पर भी दबाव बढ़ सकता है।
कानून बनने की लंबी प्रक्रिया और आगे के प्रावधान
इस पूरे मामले में सबसे ध्यान देने वाली बात यह है कि भारत पर अभी तक कोई भी नया 100 प्रतिशत टैरिफ लागू नहीं किया गया है। पूरी तरह से कानून बनने के लिए इस बिल को पहले अमेरिकी प्रतिनिधि सभा यानी हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स से पारित होना होगा। इसके बाद अमेरिकी राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के बाद ही यह बिल एक पूर्ण कानून का रूप लेगा। हालांकि, कानून बन जाने के बाद भी टैरिफ लगाना स्वतः अनिवार्य नहीं होगा, बल्कि अमेरिकी राष्ट्रपति के पास यह अधिकार सुरक्षित रहेगा कि वे तय करें कि इस कड़े प्रावधान का इस्तेमाल कब और किन-किन देशों के खिलाफ करना है। यह विधेयक केवल रूस से तेल खरीदने वाले देशों को ही निशाना नहीं बना रहा है, बल्कि इसमें रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, शीर्ष सैन्य अधिकारियों, बड़े कारोबारी समूहों, वित्तीय संस्थानों और ऊर्जा क्षेत्र पर भी नए प्रतिबंध लगाने के कड़े प्रावधान शामिल किए गए हैं। इसके अलावा, रूसी तेल के परिवहन में इस्तेमाल होने वाले तथाकथित 'शैडो फ्लीट' के खिलाफ भी कड़ी कार्रवाई को इस प्रस्तावित प्रतिबंध का मुख्य हिस्सा बनाया गया है।
संसद में मिला भारी समर्थन और भविष्य की आशंकाएं
इस महत्वपूर्ण विधेयक को अमेरिकी सीनेट में रिपब्लिकन और डेमोक्रेटिक दोनों ही दलों के सांसदों का बहुत व्यापक समर्थन प्राप्त हुआ है। सीनेट में यह बिल 86-11 के भारी बहुमत से पारित हुआ है। हालांकि, कुछ सांसदों ने राष्ट्रपति को इतने व्यापक टैरिफ अधिकार दिए जाने को लेकर अपनी कड़ी आपत्ति भी दर्ज कराई है। रैंड पॉल और डेमोक्रेटिक सीनेटर रॉन वाइडेन समेत कई आलोचकों का साफ तर्क है कि राष्ट्रपति को इतने असीमित अधिकार देने से इस टैरिफ का इस्तेमाल रूस पर दबाव बनाने के बजाय अन्य दूसरे व्यापारिक विवादों में भी किया जा सकता है। वहीं दूसरी तरफ, इस बिल का समर्थन करने वाले सांसदों का कहना है कि रूस की ऊर्जा आय पर लगातार दबाव डालना यूक्रेन युद्ध के खिलाफ एक बहुत प्रभावी आर्थिक रणनीति साबित हो सकती है। उनका यह तर्क है कि रूस के प्रमुख ऊर्जा खरीदारों को दूसरे विकल्प चुनने के लिए मजबूर करने से मॉस्को की युद्ध लड़ने की क्षमता पर बहुत बड़ा आर्थिक दबाव बढ़ाया जा सकता है। सीनेट की इस मंजूरी के बाद अब यह विधेयक आगे की मंजूरी के लिए अमेरिकी हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स में भेजा जाएगा। हाउस से मंजूरी मिलने और राष्ट्रपति के अंतिम हस्ताक्षर होने के बाद ही यह आधिकारिक कानून बन सकेगा। यदि यह बिल कानून बनता है और अमेरिकी राष्ट्रपति इसमें दिए गए अधिकारों का पूरी तरह से इस्तेमाल करते हैं, तो भारत और अमेरिका के बीच होने वाले व्यापार, भारतीय निर्यातकों के कारोबार और रूस से भारत की ऊर्जा खरीद नीति पर इसका बहुत बड़ा असर पड़ सकता है। फिलहाल, अमेरिकी सीनेट ने भारत पर कोई टैरिफ नहीं लगाया है, बल्कि एक ऐसा कानून तैयार करने की तरफ कदम बढ़ाया है जो भविष्य में राष्ट्रपति को ऐसी शक्ति दे सकता है।