विश्व आदिवासी दिवस: मूल निवासियों के अधिकार, पहचान और संघर्ष को समर्पित है 9 अगस्त का दिन

Nura Basta8 August 20262 min read84 viewsIndia
विश्व आदिवासी दिवस: मूल निवासियों के अधिकार, पहचान और संघर्ष को समर्पित है 9 अगस्त का दिन

हर साल 9 अगस्त का दिन पूरी दुनिया में आदिवासी समुदायों के सम्मान और उनके अधिकारों की रक्षा के लिए मनाया जाता है। यह दिन आदिवासी समाज की समृद्ध संस्कृति, उनकी अद्वितीय परंपराओं और प्रकृति के साथ उनके गहरे जुड़ाव को दुनिया के सामने लाने का एक अवसर है। आदिवासी समुदाय सदियों से अपनी पहचान और अपनी ज़मीन को बचाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं, और विश्व आदिवासी दिवस इन संघर्षों को याद करने और उनके हक की आवाज उठाने का सशक्त माध्यम बनता है।

क्यों मनाया जाता है विश्व आदिवासी दिवस

आदिवासी समुदायों को भारत और विश्व के कई देशों का मूल निवासी माना जाता है, लेकिन विकास की दौड़ में यह वर्ग अक्सर मुख्यधारा से पीछे रह गया है। आदिवासी समाज को शैक्षिक, आर्थिक और सामाजिक रूप से सक्षम बनाने के उद्देश्य से पहली बार 1994 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने विश्व आदिवासी दिवस मनाने का निर्णय लिया था। 23 दिसंबर 1994 को संयुक्त राष्ट्र द्वारा पारित प्रस्ताव के बाद, वर्ष 1995 से आधिकारिक तौर पर 9 अगस्त को वैश्विक स्तर पर यह दिवस मनाया जाने लगा। इसके बाद 1995-2004 और 2005-2014 के दशकों को आदिवासी विकास के अंतरराष्ट्रीय दशक के रूप में घोषित किया गया ताकि उनकी स्वास्थ्य, शिक्षा और जीवन स्तर में सुधार किया जा सके।

GulfHindi की हर खबर सबसे पहलेJoin

आदिवासी समुदाय की वैश्विक और राष्ट्रीय स्थिति

दुनिया भर के 195 देशों में से लगभग 90 देशों में 5 हजार से अधिक अलग-अलग आदिवासी समुदाय निवास करते हैं। इन समुदायों की 4 हजार से अधिक अपनी भाषाएं हैं जो दुनिया की सांस्कृतिक विविधता का आधार हैं। विश्व की कुल आबादी का करीब 6.2 प्रतिशत हिस्सा यानी लगभग 47.6 करोड़ लोग आदिवासी समाज से आते हैं। भारत की बात करें तो 2011 की जनगणना के अनुसार, देश की कुल आबादी में आदिवासी समुदाय की हिस्सेदारी 8.6 प्रतिशत है। ओडिशा, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड, राजस्थान, और पूर्वोत्तर के राज्यों सहित अंडमान-निकोबार जैसे क्षेत्रों में इनकी बड़ी आबादी बसती है।

विकास की चुनौती और अधिकारों का संघर्ष

आदिवासी समाज अपनी विशिष्ट जीवनशैली और प्रकृति प्रेम के लिए जाना जाता है, लेकिन उनके सामने आज भी भूमि अधिकारों और सांस्कृतिक विरासत को बचाने की बड़ी चुनौती है। अक्सर विकास, राष्ट्रहित और आर्थिक तरक्की के नाम पर उनसे उनकी पुश्तैनी जमीन, जंगल और जलस्रोत छीन लिए गए हैं। इस तथाकथित विकास प्रक्रिया में लाखों लोग विस्थापित हुए हैं और संसाधन विहीन होकर संघर्ष करने को मजबूर हुए हैं। विश्व आदिवासी दिवस का मुख्य उद्देश्य आदिवासियों के जल, जंगल और जमीन पर उनके प्राकृतिक अधिकारों को सुनिश्चित करना और पर्यावरण संरक्षण में उनके योगदान को मान्यता देना है। समाज को यह समझना आवश्यक है कि आदिवासी समुदाय ने सदियों से प्रकृति को सहेजने की जो कला दुनिया को सिखाई है, वह आज के समय में कितनी महत्वपूर्ण है।

Share:

Comments

Leave a comment