Saudi Arabia पर यमन का तीखा पलटवार, तुर्की और पाकिस्तान के साथ हुए नए रक्षा समझौते पर जताई कड़ी आपत्ति.

सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान के बीच हुए नए संयुक्त रक्षा समझौते के बाद पश्चिम एशिया की राजनीति में हलचल तेज हो गई है और यमन की तरफ से इस पर बहुत कड़ी प्रतिक्रिया सामने आई है। सना और रियाद के बीच चल रहे पुराने तनाव के बीच यमन के अधिकारियों ने साफ कर दिया है कि वे इस नए सैन्य समझौते को लेकर पूरी तरह सतर्क हैं और इसे अपने खिलाफ संभावित दबाव के रूप में देख रहे हैं। ईरान के अंतरराष्ट्रीय समाचार नेटवर्क प्रेस टीवी के मुताबिक, 08 अगस्त को सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान के बीच इस रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए गए थे, जिसके बाद यमन ने इसे क्षेत्रीय शांति के खिलाफ बताया है।
यमन की चेतावनी, हमलावर माने जाएंगे समझौते में शामिल देश
यमन की सुप्रीम पॉलिटिकल काउंसिल के अध्यक्ष महदी अल-मशात ने इस समझौते की कड़ी आलोचना करते हुए कहा कि नए समझौते को यमन के खिलाफ सऊदी कार्रवाई जारी रखने के बहाने के तौर पर बिल्कुल इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि इस तरह के समझौते पिछली तारीख से लागू नहीं होते हैं और यमन की तरफ से ‘घेराबंदी के बदले घेराबंदी’ की नीति तब तक लगातार जारी रहेगी, जब तक उनके घोषित उद्देश्य पूरे नहीं हो जाते हैं। अल-मशात ने चेतावनी भरे लहजे में कहा कि जो भी देश सऊदी अरब के साथ उसकी लंबी सैन्य कार्रवाई और नाकाबंदी में शामिल होगा, उसे यमन की नजर में सीधा हमलावर माना जाएगा, चाहे इसके लिए कोई भी नाम या कारण क्यों न दिया जाए। उन्होंने सऊदी नेतृत्व से अपील की कि वे युद्ध का रास्ता छोड़ने के बजाय राजनीतिक समाधान और अच्छे पड़ोसी संबंधों की दिशा में आगे बढ़ें।
विदेश मंत्रालय और अंसारुल्लाह आंदोलन का कड़ा रुख
यमन के विदेश मंत्रालय ने भी इस संयुक्त रक्षा समझौते पर अपनी कड़ी प्रतिक्रिया दी है। मंत्रालय ने कहा कि ऐसे किसी भी क्षेत्रीय गठबंधन को लेकर गंभीर सवाल उठेंगे जिसका मुख्य उद्देश्य फिलिस्तीनी मुद्दे के समर्थन या इजरायल के खिलाफ कार्रवाई के बजाय किसी दूसरे मुस्लिम देश के खिलाफ अपना दबाव बढ़ाना हो। यमन के मंत्रालय ने रियाद से अपील की कि वे यमन के खिलाफ चल रही कथित सैन्य कार्रवाई और घेराबंदी को अब पूरी तरह समाप्त करें। बयान में यह भी कहा गया कि कोई भी देश अपने आर्थिक और राजनीतिक प्रभाव का इस्तेमाल करके यमन में अपनी जवाबदेही से बच नहीं सकता है और न ही कोई समझौता किसी को दूसरे देश के अधिकारों का उल्लंघन करने का अधिकार देता है। इसके अलावा, यमन के अंसारुल्लाह आंदोलन से जुड़े मोहम्मद अल-फराह ने भी इस समझौते की आलोचना करते हुए कहा कि उनके खिलाफ चाहे जितने भी गठबंधन तैयार कर लिए जाएं, लेकिन देश की घेराबंदी समाप्त करने के लिए उनके प्रयास लगातार जारी रहेंगे। उन्होंने तुर्की, पाकिस्तान और अन्य सभी मुस्लिम देशों से यह अपील की कि वे किसी भी मुस्लिम देश के खिलाफ होने वाली सैन्य कार्रवाई या नाकाबंदी के लिए अपनी तरफ से कोई राजनीतिक आड़ उपलब्ध न कराएं।
वर्षों पुराना संघर्ष और क्षेत्रीय तनाव की पृष्ठभूमि
यमन और सऊदी अरब के बीच चल रहे इस भारी तनाव की जड़ें काफी पुरानी हैं और यह वर्षों पुराने संघर्ष से जुड़ी हुई हैं। 26 मार्च 2015 को सऊदी अरब और उसके कई सहयोगी देशों ने मिलकर यमन में एक बड़ा सैन्य अभियान शुरू किया था। इस सैन्य अभियान को अमेरिका और कुछ अन्य पश्चिमी देशों से भी राजनीतिक, सैन्य और लॉजिस्टिक समर्थन मिला था। इस लंबे संघर्ष की वजह से हजारों लोगों की जान जा चुकी है और पूरे यमन में एक गंभीर मानवीय संकट पैदा हो गया है। सऊदी नेतृत्व वाले इस गठबंधन का मुख्य घोषित उद्देश्य यमन की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त सरकार को दोबारा सत्ता में वापस लाना था, लेकिन उनका यह लक्ष्य पूरी तरह से हासिल नहीं हो सका। इसके बाद 2022 में संयुक्त राष्ट्र की मध्यस्थता से दोनों पक्षों के बीच संघर्ष विराम की स्थिति जरूर बनी थी, लेकिन इसके बाद भी क्षेत्र में तनाव और सैन्य गतिविधियां पूरी तरह से बंद नहीं हुई थीं। अब इस नए रक्षा समझौते के सामने आने के बाद यह देखना बेहद महत्वपूर्ण होगा कि आने वाले दिनों में इसका क्षेत्रीय सुरक्षा समीकरणों और यमन-सऊदी संबंधों पर क्या असर पड़ता है।