गाजा से फलस्तीनियों को हटाने के इसराइली प्रस्ताव पर भड़का अरब जगत, संयुक्त राष्ट्र ने दी कड़ी चेतावनी

गाजा पट्टी से फलस्तीनी लोगों को जबरन हटाने और विस्थापित करने के इसराइली मंत्रियों के विवादित बयानों के खिलाफ पूरी दुनिया में विरोध की लहर दौड़ गई है। 6 सितंबर 2026 को अरब लीग यानी League of Arab States ने इस मामले पर एक कड़ी बैठक की और इस तरह के बयानों को अंतरराष्ट्रीय कानून का सीधा उल्लंघन बताया। संगठन के महासचिव नबिल् फहमी ने साफ तौर पर कहा कि इस तरह की बातें न केवल क्षेत्रीय शांति को खतरे में डालती हैं, बल्कि शांति प्रयासों को भी पूरी तरह से कमजोर करती हैं। उन्होंने यह भी दोहराया कि गाजा हमेशा से अधिकृत फलस्तीनी भूमि का एक अहम हिस्सा रहा है और इसके साथ किसी भी तरह का खिलवाड़ बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
कई देशों ने जारी किया संयुक्त बयान
इस विरोध प्रदर्शन में केवल अरब लीग ही नहीं, बल्कि दुनिया के कई अन्य देश भी शामिल हुए। मिस्र, कतर, जॉर्डन, संयुक्त अरब अमीरात, इंडोनेशिया, पाकिस्तान, तुर्की और सऊदी अरब के विदेश मंत्रियों ने मिलकर एक संयुक्त बयान जारी किया। इन देशों के नेताओं ने मिलकर यह साफ कर दिया कि फलस्तीनी नागरिकों को उनके घरों से जबरन बेदखल करना सीधे तौर पर उनके बुनियादी अधिकारों पर हमला है। इन सभी देशों ने 4 जून 1967 की सीमाओं के आधार पर दो-राष्ट्र समाधान यानी two-state solution की बात पर जोर दिया और कहा कि पूर्वी येरुशलम को राजधानी बनाया जाना चाहिए ताकि इस विवाद का स्थाई हल निकल सके। इस बारे में अधिक जानकारी State Information Service Egypt की रिपोर्ट में देखी जा सकती है।
क्या है इसराइली मंत्रियों की योजना
यह पूरा विवाद इसराइली सरकार के कुछ मंत्रियों के बयानों और प्रस्तावों के बाद शुरू हुआ। इसराइल के नेशनल सिक्योरिटी मिनिस्टर इतामार बेन-गवीर ने सात साल की एक ऐसी योजना सामने रखी जिसमें उन्होंने गाजा के फलस्तीनियों को स्वेच्छा से यानी अपनी मर्जी से जाने के लिए प्रोत्साहित करने की बात कही। इसके अलावा डिफेंस मिनिस्टर इसराइल काट्ज़ ने भी इसी तरह की बात दोहराई और कहा कि गाजा के लोगों को वहां से हटाना ही इस संघर्ष का एकमात्र और आखिरी विकल्प बचा है। काट्ज़ ने यह भी बताया कि भले ही अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने फिलहाल इस प्रस्ताव पर रोक लगा दी है, लेकिन इसराइली सरकार ने इस योजना को पूरी तरह से छोड़ा नहीं है। इसराइल का इरादा भविष्य में समुद्र और हवा के रास्ते पूरे इलाके पर नियंत्रण हासिल करके इस योजना को पूरा करने का है। इस संबंध में Qatar News Agency पर भी विस्तृत अपडेट उपलब्ध कराया गया है।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हो रही है तीखी आलोचना
इसराइली मंत्रियों के इन बयानों के बाद दुनिया भर के मानवाधिकार संगठनों और नेताओं की तरफ से बहुत तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्च कमिश्नर वोल्कर तुर्क ने चेतावनी देते हुए कहा कि इस तरह की जबरन लोगों को हटाने की योजना को साफ तौर पर जातीय संहार यानी ethnic cleansing की श्रेणी में रखा जा सकता है। अमेरिका के भीतर भी इस नीति का भारी विरोध हो रहा है। अमेरिका के उदारवादी प्रो-इसराइल संगठन जे स्ट्रीट और अमेरिकी सीनेटर क्रिस वान हॉलेन ने भी इस पूरी नीति की कड़ी निंदा की है। उन्होंने इसे ethnic cleansing करार देते हुए अमेरिका से मांग की है कि वह इस तरह के अभियानों में किसी भी तरह से मदद या समर्थन देना तुरंत बंद करे। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के संघर्ष से जुड़े व्यापक ढांचे में भी जबरन विस्थापन का विरोध शामिल है और कूटनीतिक स्तर पर इस बात का लगातार समर्थन किया जा रहा है कि फलस्तीनी अपने ही घरों में सुरक्षित रहें।