बांग्लादेश में न्यायपालिका के बजट को लेकर सरकार को भेजा गया कानूनी नोटिस, उठी सुधार की मांग

Praggya Singh sabal6 September 20264 min read17 viewsWorld
बांग्लादेश में न्यायपालिका के बजट को लेकर सरकार को भेजा गया कानूनी नोटिस, उठी सुधार की मांग

बांग्लादेश में न्यायपालिका के लिए पर्याप्त बजट आवंटित करने और लोगों के न्याय, निष्पक्ष सुनवाई व त्वरित सुनवाई के अधिकारों की रक्षा के लिए तत्काल कदम उठाने की मांग करते हुए सरकार को कानूनी नोटिस भेजा गया है। उच्चतम न्यायालय के दो वकीलों बैरिस्टर मोहम्मद हुमायूं कबीर पल्लव और बैरिस्टर मोहम्मद कौसर ने यह नोटिस रविवार को भेजा है, जिसमें देश की न्याय व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए कई गंभीर सवाल उठाए गए हैं।

ढाका ट्रिब्यून की रिपोर्ट के अनुसार यह नोटिस रजिस्टर्ड पोस्ट और ई-मेल के माध्यम से कानून और न्याय विभाग के सचिव, कैबिनेट सचिव, वित्त विभाग के सचिव, उच्चतम न्यायालय के रजिस्ट्रार जनरल और अटॉर्नी जनरल को भेजा गया है। संविधान के अनुच्छेद 21 का हवाला देते हुए नोटिस में कहा गया है कि नागरिकों की जिम्मेदारी है कि वे संविधान का सम्मान करें, जबकि वकील, अदालत के अधिकारियों के रूप में, संवैधानिक उल्लंघनों को रोकने की शपथ लेते हैं। इसके अलावा संविधान के अनुच्छेद 22 का भी उल्लेख किया गया है, जो न्यायपालिका को कार्यपालिका से अलग करने का प्रावधान करता है। इसमें तर्क दिया गया है कि पर्याप्त वित्तीय और बुनियादी ढांचे के समर्थन के बिना न्यायपालिका का सार्थक अलगाव सुनिश्चित नहीं किया जा सकता है।

बजट आवंटन को लेकर वकीलों की कड़ी आपत्ति

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नोटिस के अनुसार, 2026-27 वित्तीय वर्ष के लिए प्रस्तावित राष्ट्रीय बजट में उच्चतम न्यायालय के लिए 291 करोड़ टका आवंटित किए गए हैं, जो 2025-26 के संशोधित बजट में 270 करोड़ टका से अधिक है। हालांकि वकीलों का कहना है कि देश के इतिहास के सबसे बड़े, 9,38,000 करोड़ टका के राष्ट्रीय बजट की तुलना में यह आवंटन बेहद कम है। नोटिस में कानून मंत्री मो. असदुज्जमां के हालिया बयान का भी जिक्र किया गया है, जिन्होंने न्यायपालिका को सबसे उपेक्षित क्षेत्र बताया था। उन्होंने कहा था कि न्यायपालिका के लिए कुल आवंटन 2,200 करोड़ टका था, जबकि बांग्लादेश टेलीविजन के लिए 2,500 करोड़ टका और युवा और खेल मंत्रालय के लिए 4,000 करोड़ टका से अधिक का आवंटन किया गया था।

वकीलों का तर्क है कि यह असमानता न्यायपालिका के प्रति राज्य की उपेक्षा को दर्शाती है, जो देश के 17 करोड़ से अधिक लोगों को न्याय दिलाने के लिए जिम्मेदार है। नोटिस के अनुसार, 2,200 करोड़ टका के आवंटन का एक बड़ा हिस्सा निचली अदालतों के अधिकारियों, प्रशासन, बुनियादी ढांचे और विकास परियोजनाओं जैसे चीफ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट कोर्ट की इमारतें बनाना और ई-जुडिशियरी ऑटोमेशन के वेतन और भत्तों पर खर्च होता है। इसके बावजूद वकीलों का कहना है कि न्यायपालिका के काम के बोझ और लंबित मामलों को देखते हुए यह कुल आवंटन काफी अपर्याप्त है। पिछले दो दशकों में न्यायपालिका का आवंटन राष्ट्रीय बजट का औसतन केवल 0.41 प्रतिशत रहा है और कुछ वर्षों में तो उच्चतम न्यायालय के लिए विकास आवंटन शून्य तक पहुंच गया था।

लाखों मामले लंबित और जजों की भारी कमी

नोटिस में मीडिया रिपोर्टों का हवाला देते हुए बताया गया है कि उच्च न्यायालय और निचली अदालतों में अभी 45.1 लाख से ज्यादा मामले लंबित पड़े हैं। इसमें कहा गया है कि लंबित मामलों का यह बोझ अब केवल एक न्यायिक मुद्दा नहीं बल्कि एक बड़ा सामाजिक संकट बन गया है, जिससे जनता का भरोसा कम हो रहा है, निवेश हतोत्साहित हो रहा है और सामाजिक असमानता बढ़ रही है। जानकारी के अनुसार 31 दिसंबर 2024 तक अपीलीय डिवीजन में लगभग 31,120 मामले और उच्च न्यायालय डिवीजन में लगभग 5,80,000 मामले लंबित थे।

वर्तमान स्थिति यह है कि अपीलीय डिवीजन में अभी केवल 6 जज हैं, जबकि उच्च न्यायालय डिवीजन में 103 जज काम कर रहे हैं, जिनमें 77 स्थायी और 26 अतिरिक्त हैं। वकीलों का दावा है कि हर डिवीजन में प्रति जज मामलों का बोझ 5,000 से ज्यादा है, जो त्वरित और निष्पक्ष सुनवाई की संवैधानिक गारंटी के बिल्कुल विपरीत है। न्यायपालिका सुधार आयोग ने निचली अदालतों के जजों की संख्या लगभग 2,000 से बढ़ाकर कम से कम 6,000 करने और अपीलीय डिवीजन में कम से कम 7 जज सुनिश्चित करने की सिफारिश की थी। आयोग ने जनवरी 2025 में अपनी सिफारिशें सौंपी थीं, लेकिन उन्हें लागू करने के लिए अब तक कोई विशिष्ट बजट अनुमान जारी नहीं किया गया है। अपर्याप्त फंडिंग के कारण वकीलों के लिए चैंबर, बैठने की जगह, शौचालय, साफ पानी, डिजिटल और आईटी इंफ्रास्ट्रक्चर और लाइब्रेरी सुविधाओं की भारी कमी हो गई है।

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