दोहा डिबेट्स ने भाषाओं के तेजी से खत्म होने और दुनिया पर इसके गंभीर असर को लेकर जताई चिंता
दोहा डिबेट्स ने आगाह किया है कि 2050 तक 90% भाषाएं खत्म हो सकती हैं, जिससे सांस्कृतिक पहचान और ज्ञान का भारी नुकसान होगा।

दोहा: कतर फाउंडेशन की पहल दोहा डिबेट्स ने दुनिया भर में भाषाओं के विलुप्त होने के गहरे प्रभावों पर चर्चा की है। इस चर्चा में मुख्य रूप से इस सवाल पर गौर किया गया कि जब कोई भाषा खत्म हो जाती है, तो उसका समाज और संस्कृति पर क्या असर पड़ता है।
विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि भाषाओं के खत्म होने से दुनिया को देखने का नजरिया, परंपराएं और सामूहिक यादें पूरी तरह मिट जाती हैं। कई आदिवासी समुदायों के लिए रोजगार, स्वास्थ्य और शिक्षा की जरूरत के कारण बड़ी भाषाओं को अपनाना मजबूरी बन गया है, जिससे वे हाशिए पर जा रहे हैं और सामाजिक-आर्थिक असमानता बढ़ रही है।
भाषा के खत्म होने का मतलब सिर्फ पहचान खोना नहीं है, बल्कि पीढ़ियों से चले आ रहे जीवित रहने के तरीकों और बौद्धिक इतिहास का हमेशा के लिए मिट जाना है। संज्ञानात्मक शोध बताते हैं कि भाषा कम होने से शब्दों के चयन और समझने में दिक्कत आती है, जिसका असर याददाश्त, ध्यान और समस्या सुलझाने की क्षमता पर पड़ सकता है।
आंकड़े बताते हैं कि भाषाओं के खत्म होने की रफ्तार डराने वाली है। अनुमान है कि 2050 तक मौजूदा भाषाओं में से 90 प्रतिशत के विलुप्त होने का खतरा है। औसतन हर 40 दिन में एक भाषा गायब हो रही है और अगले सौ सालों में दुनिया की आधी भाषाएं खत्म हो सकती हैं।
कुछ मॉडलों के मुताबिक, साल 2100 तक 1,500 भाषाएं खत्म हो सकती हैं और अगले चार दशकों में यह रफ्तार तीन गुना बढ़ सकती है। इस संकट के पीछे मुख्य कारण केवल एक भाषा वाली शिक्षा प्रणाली और सामाजिक तरक्की के लिए बड़ी भाषाओं को अपनाने का दबाव है। इसके अलावा, जलवायु परिवर्तन के कारण होने वाले विस्थापन से भी भाषा बोलने वाले लोग अलग हो रहे हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि समुदाय के स्तर पर की गई कोशिशें और सही सरकारी नीतियां इन स्वदेशी भाषाओं को फिर से जीवित करने और वैश्विक सांस्कृतिक विविधता को बचाने का रास्ता हो सकती हैं।