जर्मनी ने बढ़ाई इज़राइल की ताकत, 800 मिलियन यूरो के हथियार निर्यात को दी मंजूरी.

अंतरराष्ट्रीय राजनीति में एक बार फिर से रक्षा सौदों को लेकर बड़ी चर्चा शुरू हो गई है और इस बार मामला जर्मनी तथा इज़राइल के बीच के बड़े सैन्य समझौतों से जुड़ा हुआ है। जर्मन सरकार ने संसद में पूछे गए एक आधिकारिक सवाल के जवाब में यह जानकारी दी है कि इस साल जनवरी से जून के बीच जर्मनी ने इज़राइल को करीब 800 मिलियन यूरो यानी भारतीय रुपयों में लगभग 87,720 करोड़ रुपये के हथियार और सैन्य उपकरणों के निर्यात को हरी झंडी दिखाई है। यह चौंकाने वाला आंकड़ा पिछले साल इसी अवधि में मंजूर किए गए हथियार निर्यात के कुल मूल्य से लगभग चार गुना अधिक है, जिससे यह साफ होता है कि दोनों देशों के बीच रक्षा मामलों में सहयोग लगातार नई ऊंचाइयों को छू रहा है।
रक्षा सहयोग और पनडुब्बी की डिलीवरी
रूस के अंतरराष्ट्रीय समाचार नेटवर्क रशिया टुडे यानी आरटी की रिपोर्ट के अनुसार, सरकार की तरफ से साझा किए गए इन आंकड़ों में यह भी बताया गया है कि मंजूर किए गए कुल निर्यात का लगभग एक-पांचवां हिस्सा सीधे तौर पर जर्मनी और इज़राइल के आपसी रक्षा सहयोग से जुड़ा हुआ है, जिससे खुद जर्मन सेना को भी काफी फायदा पहुंचता है। इस पूरी प्रक्रिया में सबसे बड़ा हिस्सा आईएनएस ड्रेकॉन से जुड़ा हुआ है, जो कि कुल मंजूर राशि के दो-तिहाई से भी अधिक हिस्से को कवर करता है। आपको बता दें कि यह एक खास पनडुब्बी है जिसे जर्मन शिपबिल्डर टीकेएमएस द्वारा खासतौर पर इज़राइल के लिए तैयार किया गया है। यह लगभग 70 मीटर लंबी डॉल्फ़िन-II श्रेणी की पनडुब्बी है जो लंबे समय तक पानी के भीतर चुपचाप रहने और काम करने की अचूक क्षमता रखती है। हाल ही में यह पनडुब्बी जर्मनी के कील बंदरगाह से रवाना हो चुकी है और इस समय इज़राइल की ओर लगातार आगे बढ़ रही है। जर्मन सरकार के स्पष्टीकरण के अनुसार, बाकी बचे हुए सैन्य उपकरणों में ऐसे हथियार और सामान शामिल हैं जिन्हें कानूनी तौर पर सीधे तौर पर युद्ध के हथियारों की श्रेणी में नहीं रखा जाता है, जैसे कि छोटे हथियार, जरूरी गोला-बारूद, विस्फोटक सामग्री और ड्रोन जैसे आधुनिक उपकरण।
विपक्षी दलों की तीखी प्रतिक्रिया और नीतियां
जर्मनी के इस कदम के बाद देश के भीतर राजनीतिक गलियारों में विरोधियों ने सरकार को घेरना शुरू कर दिया है। जर्मनी की विपक्षी लेफ़्ट पार्टी ने सरकार की इस विदेश नीति पर गंभीर सवाल उठाए हैं और उस पर दोहरे मापदंड अपनाने का खुला आरोप मढ़ा है। पार्टी की सांसद ली रेसनर ने खुलकर कहा है कि जर्मन सरकार एक तरफ तो इज़राइली मंत्री इतामार बेन-ग्विर के बयानों पर सार्वजनिक रूप से अपनी गहरी नाराज़गी जताती है, लेकिन दूसरी तरफ इज़राइली सरकार और वहां की सेना के साथ लगातार रक्षा सहयोग को बढ़ावा दे रही है और हथियारों की सप्लाई रोक नहीं रही है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि गाज़ा और लेबनान में लगातार जारी इज़राइली सैन्य अभियानों के बीच इस तरह के भारी-भरकम हथियार सौदों को मंजूरी देना अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी बहस का एक बड़ा मुद्दा बन गया है। इससे पहले जर्मनी ने अगस्त 2025 में गाज़ा शहर पर इज़राइल की संभावित कब्ज़े की योजना के बाद कुछ चुनिंदा हथियारों के निर्यात पर कुछ समय के लिए रोक लगा दी थी। हालांकि, अमेरिका की मध्यस्थता से जब हमास और इज़राइल के बीच युद्धविराम की स्थिति बनी, तो उसी साल नवंबर के महीने में इस प्रतिबंध को पूरी तरह से हटा लिया गया था, जिसके बाद से हथियारों की आवाजाही फिर से सामान्य हो गई।
मिसाइल परीक्षण और अंतरराष्ट्रीय दबाव
दूसरी तरफ, दोनों देशों की सेनाओं के बीच तकनीकी और सामरिक स्तर पर भी नजदीकियां लगातार बढ़ रही हैं। जर्मन नौसेना की तरफ से दी गई जानकारी के मुताबिक, उन्होंने उत्तरी अटलांटिक क्षेत्र में लगभग 500 किलोमीटर की मारक क्षमता वाली एक इज़राइली बैलिस्टिक मिसाइल का सफल परीक्षण किया है। यहां यह जानना बेहद दिलचस्प है कि जर्मनी के पास अपनी खुद की कोई भी बैलिस्टिक मिसाइल प्रणाली मौजूद नहीं है, और उसकी लंबी दूरी की मुख्य मिसाइल प्रणालियों में केवल टॉरस क्रूज़ मिसाइल ही शामिल है। इस तरह के सैन्य साझेदारियों के कारण जर्मनी को वैश्विक मंच पर भी आलोचनाओं का सामना करना पड़ रहा है। दक्षिण अफ्रीका ने इज़राइल के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय न्यायालय यानी आईसीजे में नरसंहार जैसे गंभीर आरोप लगाए हैं, हालांकि इज़राइल इन सभी आरोपों को सिरे से खारिज करता रहा है। इन तमाम घरेलू और अंतरराष्ट्रीय दबावों के बीच जर्मनी की विदेश नीति लगातार सवालों के घेरे में है, और कुछ राजनीतिक विश्लेषकों का यह भी मानना है कि जून के महीने में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की सीट हासिल करने में जर्मनी को जो असफलता हाथ लगी थी, उसके पीछे भी कहीं न कहीं उसकी यही इज़राइल समर्थक विदेश नीति एक बड़ा कारण रही है।