संयुक्त राष्ट्र में ईरान के समर्थन में उतरे चीन और रूस, वीटो का हुआ स्वागत

तेहरान में ईरानी संसद के स्पीकर मोहम्मद बागेर गालिबफ ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में चीन और रूस द्वारा किए गए वीटो का खुलकर स्वागत किया है। उन्होंने अपने बयान में कहा कि इन देशों के वोटों ने सुरक्षा परिषद के राजनीतिक दुरुपयोग को सिरे से खारिज कर दिया है और कानून के शासन को फिर से मजबूती दी है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक पोस्ट के माध्यम से उन्होंने अपनी बात रखी और दुनिया के सामने अपनी स्थिति स्पष्ट की।
एकध्रुवीय व्यवस्था का दौर खत्म हुआ
मोहम्मद बागेर गालिबफ ने आगे बताया कि वह एकध्रुवीय व्यवस्था अब पूरी तरह समाप्त हो चुकी है जिसमें एक पक्ष ताकत और दबाव के बल पर रियायतें वसूलता था। उन्होंने जोर देकर कहा कि हमें बहुपक्षीयता का बचाव करना चाहिए क्योंकि एकपक्षीय रवैया किसी के भी हित में काम नहीं करता है। उनका यह बयान उस वक्त सामने आया जब सुरक्षा परिषद उस मसौदा प्रस्ताव को अपनाने में पूरी तरह विफल रही जिसके तहत ईरान प्रतिबंध समिति का समर्थन करने वाले विशेषज्ञों के पैनल के कार्यकाल को एक साल यानी सितंबर 2027 तक बढ़ाया जाना था।
सुरक्षा परिषद में मतदान की स्थिति
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार अमेरिका द्वारा तैयार किए गए इस प्रस्ताव को गुरुवार को कुल 11 वोट पक्ष में मिले जबकि चीन और रूस ने इसके विरोध में दो वोट डाले और दो देशों ने मतदान में हिस्सा नहीं लिया। दो स्थायी सदस्यों के नकारात्मक वोटों के कारण यह प्रस्ताव पारित नहीं हो सका। इससे पहले अगस्त 2025 में फ्रांस, जर्मनी और ब्रिटेन ने ईरान पर संयुक्त राष्ट्र प्रतिबंधों को फिर से लागू करने के लिए स्नपबैक तंत्र शुरू किया था जिसे 2015 के परमाणु समझौते और रेजोल्यूशन 2231 के तहत निलंबित कर दिया गया था। रूस और चीन ने इस कदम को कानूनी रूप से पूरी तरह अमान्य बताया था।
विभिन्न देशों की प्रतिक्रियाएं
रूसी राजदूत वासिली नेबेंजिया ने मतदान से पहले साफ कहा था कि इस सत्र के लिए कोई भी कानूनी या प्रक्रियात्मक आधार मौजूद नहीं है। उन्होंने कहा कि हम सुरक्षा परिषद के कुछ सदस्यों द्वारा स्नपबैक लागू होने के दावों को वैधता देने के प्रयासों को पूरी तरह खारिज करते हैं। वहीं चीनी राजदूत फू काँग ने कहा कि परिषद को राजनीतिक टकराव और दबाव बढ़ाने का मंच बनने के बजाए आपसी बातचीत को बढ़ावा देना चाहिए। अमेरिकी राजदूत जेनिफर लोसेटा ने मतदान के बाद कहा कि वाशिंगटन इस वीटो से बिल्कुल भी हैरान नहीं है। दूसरी ओर ब्रिटिश राजदूत सारा मैकलॉइंट्स ने आरोप लगाया कि रूस और चीन ने ईरान को बचाने का रास्ता चुना है।
परमाणु कार्यक्रम की निगरानी पर असर
इस विवाद के कारण 1737 समिति को इस पूरे साल कोई अध्यक्ष नहीं मिला है और पैनल का पुनर्गठन भी नहीं किया गया है। इसके चलते अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी यानी IAEA ईरान के परमाणु कार्यक्रम की एकमात्र स्वतंत्र निगरानी करने वाली संस्था बची है। पिछले 10 सितंबर को IAEA के गवर्नर्स बोर्ड ने महानिदेशक राफेल ग्रॉसी से ईरान के नियमों का पालन न करने की बात को सुरक्षा परिषद को रिपोर्ट करने के लिए कहा था जो पिछले 20 सालों में ऐसा पहला मामला है। इस पूरी घटना की विस्तृत जानकारी आप ANI News की रिपोर्ट में देख सकते हैं। प्रस्ताव के फेल होने से अब ईरान पर प्रतिबंधों की स्वतंत्र निगरानी का रास्ता फिलहाल बंद हो गया है।