होर्मुज जलडमरूमध्य संकट से ग्लोबल एनर्जी सिस्टम पर असर, रिफाइंड ऑयल की कमी बनी बड़ी चुनौती.

दुनियाभर में ऊर्जा आपूर्ति व्यवस्था ने Strait of Hormuz यानी होर्मुज जलडमरूमध्य में आए व्यवधान का सामना उम्मीद से बेहतर तरीके से किया है। हालांकि, कम होते तेल भंडार और रिफाइनिंग क्षमता पर बढ़ता दबाव आने वाले समय में बड़ी मुश्किलें पैदा कर सकता है। मैकिंजी ग्लोबल इंस्टीट्यूट की एक रिपोर्ट के मुताबिक, इस संकट से निपटने के लिए अब तक कई तरह के विकल्प काम आए हैं लेकिन इनकी भी अपनी सीमाएं हैं जो अब साफ नजर आने लगी हैं। खाड़ी देशों में ऊर्जा सुरक्षा और तेल आपूर्ति को लेकर स्थिति लगातार बदल रही है, जिसका सीधा असर ग्लोबल मार्केट पर पड़ रहा है।
घटता तेल भंडार और रिफाइनिंग पर दबाव
रिपोर्ट के अनुसार, अगस्त के आखिर तक वैश्विक तेल भंडारों से लगभग आधी बिलियन बैरल तेल निकाला जा चुका है, जो कि लगभग पांच दिनों की वैश्विक तेल मांग के बराबर है। अमेरिका के स्ट्रैटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व यानी SPR में स्टॉक घटकर 300 मिलियन बैरल से भी कम रह गया है। साल 2022 से पहले यह आंकड़ा करीब 600 मिलियन बैरल था और साल 2025 के अंत तक यह करीब 400 मिलियन बैरल के आसपास था। इसके अलावा रिफाइनिंग क्षमता पर भी भारी दबाव देखा गया है। खाड़ी देशों की रिफाइनरियों ने अपना उत्पादन 25 प्रतिशत से ज्यादा कम कर दिया है, जबकि जुलाई के बीच में रूस की लगभग 2 मिलियन बैरल प्रतिदिन की रिफाइनिंग क्षमता बंद पड़ी थी।
रिफाइंड प्रोडक्ट्स की भारी किल्लत
कच्चे तेल के मुकाबले रिफाइंड उत्पादों का स्टॉक काफी कम और बिखरा हुआ है। जुलाई के आखिर तक यूरोप में जेट ईंधन और अमेरिका में पेट्रोल जैसे कई उत्पादों का भंडार पांच साल के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया था। इस स्थिति से निपटने के लिए विभिन्न देश और कंपनियां अधिक बिजली का इस्तेमाल, साफ ऊर्जा को बढ़ावा देना, तेल और गैस की अतिरिक्त आपूर्ति बढ़ाना, नई पाइपलाइन बिछाना और व्यापार के नए रास्ते तलाशने जैसे उपायों पर विचार कर रही हैं। मैकिंजी का अनुमान है कि जो उपाय अभी चल रहे हैं या जिन पर चर्चा हो रही है, वे साल 2030 तक होर्मुज जलडमरूमध्य से होने वाले संकट के समय 35 प्रतिशत से 70 प्रतिशत तक तेल के बहाव की भरपाई कर सकते हैं।
ऊर्जा सुरक्षा की ऊंची कीमत
ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने के लिए आर्थिक और पर्यावरणीय मोर्चे पर भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है। खाड़ी क्षेत्र के बाहर नया तेल मंगाने की लागत USD 40 से USD 60 प्रति बैरल तक हो सकती है, जबकि कोल-टू-लिक्विड क्षमता की नई लागत USD 75 से USD 185 प्रति बैरल तक बैठ सकती है। इसकी तुलना में खाड़ी देशों का अधिकांश तेल उत्पादन USD 30 प्रति बैरल से भी कम लागत में होता है। भविष्य में ऊर्जा संकट से निपटने के लिए केवल एक ही स्रोत पर निर्भर रहने के बजाय अलग-अलग रास्तों, भंडारों और विकल्पों का एक मजबूत ढांचा तैयार करना होगा, ताकि खाड़ी देशों में काम करने वाले प्रवासियों और ग्लोबल मार्केट पर इसका ज्यादा असर न पड़े।