गल्फ में रहने वाले 99 लाख से ज्यादा भारतीयों के लिए बड़ी खबर, रिटायरमेंट को लेकर आई चौंकाने वाली रिपोर्ट

गल्फ देशों में अपनी रोजी-रोटी कमाने गए लाखों भारतीयों के बुढ़ापे को लेकर एक बहुत बड़ी और चिंता बढ़ाने वाली बात सामने आई है। अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन यानी ILO ने अगस्त 2026 में एक रिपोर्ट जारी की है, जिसमें गल्फ देशों में रहने वाले लगभग 9.95 मिलियन यानी करीब 99 लाख 50 हजार भारतीय नागरिकों के सामने रिटायरमेंट के बाद पैसों की तंगी आने की बात कही गई है। इस रिपोर्ट का नाम Old-age security in the South Asia–Gulf migration corridor रखा गया है, जिसे STREAM प्रोग्राम के तहत पब्लिश किया गया है। विदेश मंत्रालय के मार्च 2026 के आंकड़ों के अनुसार, गल्फ देशों में रहने वाले इस बड़े भारतीय समुदाय में अकेले संयुक्त अरब अमीरात यानी UAE में 4.326 मिलियन और सऊदी अरब में 2.748 मिलियन भारतीय शामिल हैं। इसके अलावा, सऊदी अरब के कुल वर्कफोर्स में 76% और कतर के वर्कफोर्स में 95% हिस्सेदारी प्रवासी मजदूरों की ही है।
गल्फ की मौजूदा नौकरी प्रणाली और एन्ड-ऑफ-सर्विस का सच
गल्फ देशों का मौजूदा लेबर सिस्टम इस सोच पर काम करता है कि वहां काम करने वाले लोग सिर्फ कुछ समय के लिए ही रहेंगे। इसी वजह से लंबे समय तक वहां काम करने वाले कर्मचारियों को सरकारी पेंशन योजनाओं का फायदा नहीं मिलता है। इसके बजाय, जब नौकरी पूरी हो जाती है या कॉन्ट्रैक्ट खत्म होता है, तो कंपनियों की तरफ से कर्मचारियों को एक मुश्त पैसा दिया जाता है जिसे End-of-Service Indemnity (EOSI) यानी ग्रेच्युटी कहा जाता है। आम तौर पर UAE के प्राइवेट सेक्टर के नियमों के मुताबिक, शुरुआती पांच सालों के लिए हर साल के हिसाब से 21 दिन की बेसिक सैलरी और उसके बाद के सालों के लिए हर साल 30 दिन की सैलरी जोड़ी जाती है, जिसकी अधिकतम सीमा आमतौर पर दो साल के वेतन तक होती है। ILO की रिपोर्ट में यह साफ कहा गया है कि पैसों के लेन-देन का यह तरीका बुढ़ापे की सुरक्षा के अंतरराष्ट्रीय मानकों पर खरा नहीं उतरता है। महंगाई, इलाज का खर्च, रहने का किराया और परिवार को संभालने में यह पैसा बहुत जल्दी खत्म हो जाता है।
बुजुर्ग प्रवासियों के सामने खड़ी होती हैं ये बड़ी मुश्किलें
जब ये प्रवासी मजदूर उम्रदराज होते हैं, तो उन्हें मुख्य रूप से तीन बड़ी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। पहला तो रिटायरमेंट के बाद आमदनी का कोई पक्का जरिया नहीं होता है, दूसरा नौकरी खत्म होने के साथ ही कंपनियों की तरफ से मिलने वाला हेल्थ इंश्योरेंस भी बंद हो जाता है, और तीसरा रेजिडेंसी यानी वहां रहने का अधिकार सीधा नौकरी से जुड़ा होने के कारण अनिश्चितता बनी रहती है। हालांकि कुछ देशों ने इस दिशा में सुधार करने की कोशिश की है। उदाहरण के लिए, UAE में स्वैच्छिक वैकल्पिक EOSI बचत योजना शुरू की गई है, ओमान और बहरीन में प्रोविडेंट फंड जैसे मॉडल लाए गए हैं, और सऊदी अरब में सोशल इंश्योरेंस के दायरे को बढ़ाया गया है। इसके बावजूद ILO का कहना है कि ये सारी योजनाएं मुख्य तौर पर अस्थायी रूप से आने वाले कामगारों को ध्यान में रखकर बनाई गई हैं, न कि उन परिवारों के लिए जो वहां पीढ़ियों से बस गए हैं। नवंबर 2024 से नवंबर 2028 तक चलने वाला STREAM प्रोग्राम इन सभी छह गल्फ देशों और उनके अपने गृह देशों के बीच फायदों को ट्रांसफर करने में आसानी लाने के लिए काम कर रहा है।
भारत के इन राज्यों पर पड़ेगा सबसे ज्यादा असर
सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय यानी MoSPI और संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष यानी UNFPA के आंकड़ों से पता चलता है कि जैसे-जैसे गल्फ से लौटने वाले बुजुर्ग भारतीयों की संख्या बढ़ेगी, वैसे-वैसे इन रिटायर्ड लोगों को संभालने का बोझ भारत के कई राज्यों पर आ जाएगा। इन राज्यों में मुख्य रूप से केरल, उत्तर प्रदेश, बिहार, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और राजस्थान शामिल हैं। ILO की रिपोर्ट में इस बात पर जोर दिया गया है कि लंबे समय से वहां रह रहे प्रवासी परिवारों की इस असुरक्षा को खत्म करने के लिए नीतिगत बदलाव किए जाने चाहिए। इसमें अनिवार्य रूप से पैसे बचाने की योजनाएं, गैर-नागरिकों के लिए रिटायरमेंट के बाद इलाज की सुविधा और रिटायरमेंट से जुड़े हुए रहने के विकल्पों को शामिल करने की मांग की गई है ताकि गल्फ से लौटने वाले भारतीयों का बुढ़ापा सुरक्षित हो सके।