ILO Report: गल्फ देशों में रहने वाले प्रवासियों के रिटायरमेंट फंड पर बड़ा खतरा, रिपोर्ट में खुलासा.

Aanya8 September 20263 min read35 viewsExpat Issues
ILO Report: गल्फ देशों में रहने वाले प्रवासियों के रिटायरमेंट फंड पर बड़ा खतरा, रिपोर्ट में खुलासा.

अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन यानी ILO ने अगस्त 2026 में एक नई रिपोर्ट जारी की है, जिसका शीर्षक Old-age security in the South Asia–Gulf migration corridor है। इस रिपोर्ट में संयुक्त अरब अमीरात यानी UAE और अन्य GCC देशों में रहने वाले लाखों प्रवासियों के बुढ़ापे की सुरक्षा को लेकर बड़ी चिंता जताई गई है। रिपोर्ट के अनुसार, गल्फ देशों में काम करने वाले करोड़ों प्रवासियों के लिए रिटायरमेंट के समय मिलने वाले फायदे नाकाफी साबित हो रहे हैं, जिससे वहां रहने वाले आम लोगों की मुश्किलें लगातार बढ़ती जा रही हैं।

भारतीय प्रवासियों की बड़ी संख्या और मौजूदा नियम

भारत के विदेश मंत्रालय के मार्च 2026 तक के आंकड़ों के मुताबिक, यूएई में 43.26 मिलियन और सऊदी अरब में 27.48 मिलियन भारतीय नागरिक रहते हैं। इसके अलावा छह GCC देशों में कुल भारतीय आबादी लगभग 80 मिलियन तक पहुंचती है। गल्फ देश आमतौर पर प्रवासी मजदूरों को एक अस्थायी व्यवस्था के रूप में देखते हैं, लेकिन हकीकत यह है कि कई परिवार वहां दशकों से रह रहे हैं और अब उनकी दूसरी पीढ़ी भी वहीं जीवन बिता रही है। इसके बावजूद इन देशों में कोई पक्की राष्ट्रीय पेंशन योजना नहीं है, जिस वजह से लोगों को भविष्य की चिंता सताती रहती है।

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फिलहाल अधिकांश कर्मचारी हर महीने मिलने वाली पेंशन के बजाय केवल End-of-Service Indemnity (EOSI) यानी सेवा समाप्ति पर मिलने वाले मुआवजे पर ही निर्भर रहते हैं। यूएई में यह नियम है कि शुरुआती पांच साल के लिए हर साल के हिसाब से 21 दिन का मूल वेतन और उसके बाद के सालों के लिए 30 दिन का वेतन दिया जाता है, जिसकी सीमा अक्सर दो साल के वेतन तक तय होती है। इसके अलावा ज्यादातर भारतीय प्रवासी कर्मचारी Employees' Provident Fund Organization (EPFO) के दायरे से बाहर ही रहते हैं, जिससे उन्हें रिटायरमेंट के बाद किसी तरह का सरकारी आर्थिक सहारा नहीं मिल पाता है।

बढ़ता खर्च और कामगारों की मजबूरी

आंकड़े बताते हैं कि सऊदी अरब में कुल कामगारों का 76% हिस्सा प्रवासी मजदूरों का है, जबकि कतर में यह आंकड़ा 95% तक पहुंचता है। ILO द्वारा की गई बातचीत में यह बात सामने आई है कि कई कम और मध्यम आय वाले भारतीय परिवारों को गल्फ देशों में रहने के दौरान बढ़ रहे स्वास्थ्य सेवाओं के खर्च और महंगे जीवन स्तर के कारण अपनी योजना से ज्यादा समय तक वहां रुकना पड़ता है। हालांकि यूएई ने सेवा समाप्ति के लिए एक वैकल्पिक बचत योजना शुरू की है जो Dubai International Financial Centre (DIFC) में अनिवार्य है, और ओमान तथा बहरीन जैसे देश भी प्रोविडेंट फंड मॉडल पर विचार कर रहे हैं, लेकिन कम वेतन पाने वाले मजदूरों को अक्सर इन योजनाओं का पूरा फायदा नहीं मिल पाता है।

इस पूरी स्थिति पर पहले भी मीडिया में खबरें आ चुकी हैं, जिनमें The Logical Indian ने 7 सितंबर 2026 को और Deccan Herald ने 3 सितंबर 2026 को रिपोर्ट प्रकाशित की थी। ILO ने अपनी सिफारिशों में कहा है कि GCC देशों को वैकल्पिक सेवा समाप्ति योजनाओं को अनिवार्य करना चाहिए और उनमें पेंशन जैसी सुविधाएं भी शामिल करनी चाहिए। इसके अलावा बुजुर्ग प्रवासियों के लिए सस्ते इलाज की सुविधा बढ़ाने और भारतीय सरकार से यह अनुरोध किया गया है कि वे प्रवासी कॉरिडोर के साथ EPFO या National Pension System (NPS) जैसी योजनाओं को जोड़ने पर विचार करें।

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