भारत में आम लोगो को लगने वाला हैं महंगाई का बड़ा झटका, Electric गाड़ियों को खरीदने में याद आएगी नानी

Lov Singh14 September 20265 min read20 viewsIndia
भारत में आम लोगो को लगने वाला हैं महंगाई का बड़ा झटका, Electric गाड़ियों को खरीदने में याद आएगी नानी

एक ज़माना था जब भारत में गाड़ी खरीदना एक सपना नहीं, एक हक जैसा लगता था। पेट्रोल की गाड़ी अच्छा माइलेज देती थी, डीजल वाली उससे भी सस्ती चलती थी, और अगर बजट थोड़ा टाइट हो तो सीएनजी एक भरोसेमंद विकल्प था। मध्यम वर्ग का हर परिवार जानता था कि थोड़ी बचत करके, थोड़ी EMI भरकर, एक दिन गाड़ी उनके घर के बाहर खड़ी होगी।

आज वही हिसाब-किताब गड़बड़ा गया है। और यह किसी एक वजह से नहीं, बल्कि चार-पांच अलग-अलग दिशाओं से आए दबाव का नतीजा है।

इलेक्ट्रिक की तरफ धकेला जा रहा देश, पर सीढ़ी अधूरी है

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सरकार की PM E-DRIVE योजना का मकसद साफ है — देश को इलेक्ट्रिक वाहनों की तरफ मोड़ना। योजना की अवधि अब मार्च 2028 तक बढ़ा दी गई है, और इसका कुल परिव्यय लगभग 10,900 करोड़ रुपये है। लेकिन बारीकी से देखें तो असली फायदा आम आदमी की दोपहिया-तिपहिया गाड़ी को सबसे पहले छोड़कर जाने वाला है — इलेक्ट्रिक दोपहिया, ई-रिक्शा और तिपहिया वाहनों पर मिलने वाली सब्सिडी मार्च 2026 में ही खत्म हो रही है। बचती है सिर्फ ई-बस, ई-ट्रक और ई-एम्बुलेंस जैसी बड़ी श्रेणियों की सब्सिडी, जो 2028 तक चलेगी — वह भी तब तक, जब तक तय बजट खत्म न हो जाए।

मतलब यह कि जिस आम आदमी की स्कूटी या ऑटो-रिक्शा को सस्ता इलेक्ट्रिक विकल्प चाहिए था, उसकी सब्सिडी की खिड़की सबसे पहले बंद हो रही है। और जब यह योजना पूरी तरह खत्म होगी, तब तक न चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर हर गली-मोहल्ले तक पहुंचा होगा, न बैटरी की कीमतें इतनी गिरी होंगी कि इलेक्ट्रिक गाड़ी वाकई "सबकी गाड़ी" बन सके। नतीजा — सब्सिडी हटते ही इलेक्ट्रिक गाड़ी फिर से उसी तबके की चीज़ बन जाएगी, जो पहले से बिना सब्सिडी के भी खरीद सकता था।

पेट्रोल की गाड़ी अब पहले जैसी नहीं रही

दूसरी तरफ, जिस पेट्रोल गाड़ी पर आम आदमी अब तक भरोसा करता आया था, उसका माइलेज भी अब वही नहीं रहा। E20 यानी 20% इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल अब देश के ज़्यादातर पंपों पर एकमात्र विकल्प बन चुका है। सरकार का अपना पेट्रोलियम मंत्रालय मानता है कि नई गाड़ियों में भी माइलेज 1-2% तक गिर सकता है, जबकि पुरानी गाड़ियों में यह गिरावट 6% तक जा सकती है। वाहन निर्माताओं की संस्था SIAM का कहना है कि यह गिरावट 2-4% के बीच है। सोशल मीडिया पर हज़ारों लोग शिकायत कर रहे हैं कि उन्हें पहले से ज़्यादा बार पेट्रोल भरवाना पड़ रहा है — और कइयों को तो यह पता ही नहीं था कि उनकी गाड़ी में इथेनॉल मिला पेट्रोल जा रहा है, जब तक उनकी जेब पर असर नहीं दिखा।

सरकार का तर्क है कि इससे कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता कम होती है और किसानों को फायदा मिलता है — यह तर्क अपनी जगह ठीक भी है। लेकिन जिस आम आदमी की मासिक बजट-शीट पहले से तंग है, उसके लिए यह "1-2% या 6%" सिर्फ आंकड़ा नहीं, हर महीने की एक अतिरिक्त परेशानी है।

डीजल, जो सस्ता विकल्प था, अब सीमित होता जा रहा

डीजल गाड़ियां कभी उन परिवारों की पसंद हुआ करती थीं जिन्हें ज़्यादा माइलेज और ज़्यादा टॉर्क चाहिए होता था — खासकर छोटे शहरों और कस्बों में। लेकिन बीएस-6 इमिशन नॉर्म्स लागू होने के बाद छोटे और किफायती डीजल इंजन बनाना कंपनियों के लिए महंगा सौदा बन गया। मारुति सुजुकी जैसी कंपनियां पहले ही अपनी छोटी डीजल गाड़ियों और वेरिएंट्स को चरणबद्ध तरीके से बंद कर चुकी हैं। बड़ी SUV और कमर्शियल गाड़ियों में डीजल अभी भी मिलता है, पर वह भी आम आदमी के बजट से कहीं ऊपर की श्रेणी है। यानी जो डीजल कभी "सस्ता और टिकाऊ" विकल्प था, वह अब या तो बंद हो चुका है या प्रीमियम कीमत पर मिल रहा है।

सीएनजी — भरोसा तो है, पर भरोसा दिलाने वाला नेटवर्क नहीं

बचा सीएनजी, जिसे सबसे किफायती विकल्प माना जाता रहा है। लेकिन असली दिक्कत यहां भी वही पुरानी है — नेटवर्क का फैलाव और गाड़ी की ड्राइविंग रेंज। शहर के भीतर तो फिर भी ठीक है, पर हाईवे पर निकलते ही सीएनजी पंप ढूंढना और वहां लगने वाली लंबी कतार में समय गंवाना एक आम अनुभव बन चुका है। जिस आम आदमी के पास समय की सबसे ज़्यादा कमी है, उसके लिए एक टंकी भरवाने में आधा-एक घंटा निकल जाना कोई छोटी बात नहीं।

तो सवाल यह है — 2028 के बाद क्या?

जब PM E-DRIVE जैसी योजनाएं खत्म होंगी, पेट्रोल का माइलेज इथेनॉल की वजह से घटता रहेगा, डीजल का किफायती विकल्प और सिकुड़ेगा, और सीएनजी का इंफ्रास्ट्रक्चर उस रफ्तार से नहीं बढ़ेगा जितनी मांग होगी — तब आम आदमी के सामने विकल्प क्या बचेगा?

यही वह जगह है जहां नीति और ज़मीनी हकीकत के बीच का फासला साफ दिखता है। इलेक्ट्रिक भविष्य की तरफ बढ़ना गलत दिशा नहीं है — दुनिया उसी तरफ जा रही है। लेकिन बदलाव तभी टिकाऊ होता है जब वह उस आदमी को साथ लेकर चले जो हर महीने की किश्त गिनकर चलता है, न कि उसे पीछे छोड़कर। सब्सिडी हटाने से पहले चार्जिंग स्टेशन हर तीसरे गांव तक पहुंचना चाहिए था। इथेनॉल बढ़ाने से पहले गाड़ी मालिकों को साफ-साफ बताना चाहिए था कि उनकी पुरानी गाड़ी पर क्या असर पड़ेगा। और डीजल हटाने से पहले कोई किफायती विकल्प तैयार होना चाहिए था।

फिलहाल हो यह रहा है कि पुराना विकल्प एक-एक करके बंद हो रहा है, और नया विकल्प अभी भी आम आदमी की पहुंच से बाहर है। बीच का यह खालीपन — यही वह जगह है जहां आज का भारतीय उपभोक्ता खुद को खड़ा पाता है: चार दरवाज़ों के बीच, और हर दरवाज़े पर एक नया ताला।

गाड़ी अब भी ज़रूरत है — रोज़ी-रोटी कमाने का ज़रिया, बच्चों को स्कूल भेजने का साधन, बुज़ुर्गों को अस्पताल ले जाने की सुविधा। सवाल सिर्फ यह नहीं कि भविष्य कैसा हो, सवाल यह भी है कि उस भविष्य तक पहुंचने का रास्ता किसके लिए खुला रहेगा — और किसके लिए बंद हो जाएगा।

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