इराक ने किया अपनी मुद्रा का अवमूल्यन, डॉलर महंगा होने से मचा बवाल

इराक के सेंट्रल बैंक ने दीनार की वैल्यू घटाकर डॉलर की दर बढ़ाई है, जिससे देश में राजनीतिक तनाव और बाजार में उथल-पुथल मच गई है।

Gautam Sahu8 October 20262 min read8 viewsWorld
इराक ने किया अपनी मुद्रा का अवमूल्यन, डॉलर महंगा होने से मचा बवाल

इराक की अर्थव्यवस्था में एक बड़ा फेरबदल देखने को मिला है। सेंट्रल बैंक ऑफ इराक (CBI) ने आधिकारिक तौर पर अपनी राष्ट्रीय मुद्रा 'इराकी दीनार' का अवमूल्यन (Devaluation) कर दिया है। इस फैसले के बाद अब डॉलर के मुकाबले दीनार की कीमत काफी गिर गई है, जिससे देश के बाजारों और राजनीति में हड़कंप मच गया है। यह कदम उन पिछले प्रयासों के बिल्कुल उलट है, जिनके जरिए मुद्रा को मजबूत करने की कोशिश की जा रही थी।

नया एक्सचेंज रेट स्ट्रक्चर 7 अक्टूबर, 2026 से लागू हो गया है। इस नई व्यवस्था के तहत, सेंट्रल बैंक अब वित्त मंत्रालय से 1,500 दीनार प्रति डॉलर की दर से डॉलर खरीदेगा, जबकि बैंकों को यह 1,510 दीनार पर बेचा जाएगा। आम जनता के लिए बैंकों से डॉलर खरीदने की दर 1,520 दीनार तय की गई है। बता दें कि फरवरी 2023 से अब तक 1,320 दीनार प्रति डॉलर की दर लागू थी, जिससे अब कीमतों में बड़ा उछाल आया है।

आर्थिक संकट और राजनीतिक विरोध

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सेंट्रल बैंक के गवर्नर निज़ार हुसैन ने संसदीय वित्त समिति को स्पष्ट किया कि 1,500 दीनार की यह दर फिलहाल तय है और इसमें किसी भी बदलाव का मतलब होगा पूरे संघीय बजट के ड्राफ्ट को फिर से तैयार करना। सरकारी अधिकारियों ने इस कदम को एक 'सर्जिकल ऑपरेशन' की तरह बताया है। उनके मुताबिक, तेल निर्यात में गिरावट और होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) के जरिए होने वाले व्यापार में संभावित बाधाओं के कारण यह कड़ा फैसला लेना जरूरी था।

हालांकि, इस फैसले ने इराक में राजनीतिक तूफान खड़ा कर दिया है। बगदाद के बाजारों में डॉलर की दरें तेजी से ऊपर-नीचे हो रही हैं, जहाँ 100 डॉलर की कीमत लगभग 167,000 दीनार तक पहुँच गई है। संसद में भी इस फैसले का कड़ा विरोध हो रहा है। सांसद सुज़ान अल-साद ने इस निर्णय के परिणामों पर चर्चा करने के लिए एक सत्र बुलाने हेतु 50 से अधिक हस्ताक्षर जुटाए हैं, जबकि सांसद सबा अल-सादी ने इस बढ़ोतरी को एक 'रेड लाइन' करार दिया है।

इतना ही नहीं, इस्लामिक दावा पार्टी ने चेतावनी दी है कि इस कदम से सामाजिक अशांति फैल सकती है। अर्थशास्त्रियों ने भी इस समय पर लिए गए फैसले की आलोचना की है। जानकारों का मानना है कि अगर वित्तीय स्थिति को जल्द स्थिर नहीं किया गया, तो इराक को अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) की मदद लेने पर मजबूर होना पड़ सकता है।

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