भारत का सबसे बड़ा तेल सप्लायर बना रूस, अमेरिकी पाबंदियों के बावजूद अगस्त में आयात रहा सबसे आगे.

अमेरिकी प्रतिबंधों के बढ़ते खतरे और आयात में मामूली गिरावट के बाद भी रूस ने अगस्त के महीने में भारत के सबसे बड़े कच्चे तेल सप्लायर के तौर पर अपनी जगह बरकरार रखी है। मैरीटाइम इंटेलिजेंस फर्म केप्लर के सामने आए आंकड़ों के अनुसार, इस साल के आठवें महीने यानी अगस्त में रूस की तरफ से भारत को हर दिन करीब 21 लाख बैरल कच्चा तेल भेजा गया, जो देश के कुल तेल आयात का लगभग 45 प्रतिशत हिस्सा बनता है।
जुलाई के मुकाबले अगस्त में आई तेल खरीद में कमी
हालांकि रूस से होने वाली यह तेल सप्लाई जुलाई के महीने के मुकाबले थोड़ा नीचे आई है। जानकारी के मुताबिक, जुलाई के महीने में रूस ने भारत को हर दिन लगभग 28 लाख बैरल तेल सप्लाई किया था, जो भारत की कुल क्रूड खरीद के आधे हिस्से से भी ज्यादा था। रूस के अंतरराष्ट्रीय समाचार टेलीविजन नेटवर्क रशिया टुडे (आरटी) ने केप्लर फर्म के हवाले से इस बात की जानकारी साझा की है कि अगस्त में भारत का कुल कच्चा तेल आयात घटकर प्रतिदिन लगभग 46 लाख बैरल पर आ गया।
अगर इसकी तुलना जुलाई से की जाए तो उस समय यह आंकड़ा करीब 50 लाख बैरल प्रतिदिन था, जिसका सीधा मतलब है कि एक महीने के भीतर ही देश के कुल तेल आयात में करीब 8 फीसदी की कमी दर्ज की गई है। जानकारों और बाजार विश्लेषकों का मानना है कि अगस्त के महीने में रूसी तेल की कम खरीद को केवल भारत की मांग घटने के नजरिए से बिल्कुल नहीं देखा जाना चाहिए क्योंकि इसके पीछे कई दूसरे व्यावहारिक कारण भी शामिल हैं।
मध्य पूर्व का संघर्ष और रिफाइनरियों का मेंटेनेंस बना वजह
मई, जून और जुलाई के दौरान मध्य पूर्व यानी मिडिल ईस्ट में लगातार जारी तनाव और संघर्ष के बीच किसी भी संभावित आपूर्ति संकट से बचने के लिए देश की ऑयल रिफाइनरियों ने भारी मात्रा में तेल की खरीद की थी। इसके बाद अगस्त के महीने में जाकर कई रिफाइनरियां अपने सामान्य खरीद स्तर पर वापस लौटीं। इसके अलावा देश की कई बड़ी रिफाइनरियों में पहले से तय शेड्यूल के मुताबिक मेंटेनेंस का काम चल रहा था और अंतरराष्ट्रीय बाजार में रूसी क्रूड की सीमित उपलब्धता ने भी इस आयात को काफी हद तक प्रभावित किया।
अबू धाबी की जानी-मानी कमोडिटी एनालिस्ट नतालिया काटोना के अनुसार, अगस्त के महीने में भारत ने अपनी मर्जी से रूसी तेल की खरीद में कोई बहुत बड़ी कटौती नहीं की थी, बल्कि असल बात यह थी कि रूस के पास अंतरराष्ट्रीय बाजार में निर्यात के लिए उपलब्ध बैरल की संख्या ही कम थी। समुद्री रास्ते के जरिए रूसी तेल का निर्यात कम होना और उपलब्ध कार्गो को हासिल करने के लिए चीनी रिफाइनरियों की तरफ से बढ़ रही कड़ी प्रतिस्पर्धा का असर भी सीधे तौर पर इस पर पड़ा।
वेनेजुएला से तेल आयात में हुई तेज बढ़ोतरी
अगस्त के इस दौर में संयुक्त अरब अमीरात (यूएई), सऊदी अरब और वेनेजुएला भारत के दूसरे सबसे प्रमुख तेल आपूर्तिकर्ता देशों की सूची में शामिल रहे। खास तौर पर लैटिन अमेरिकी देश वेनेजुएला से भारत की तरफ से होने वाली तेल की खरीद में बहुत तेज बढ़ोतरी दर्ज की गई है। केप्लर के आंकड़ों से यह बात सामने आई है कि अगस्त के महीने में वेनेजुएला से होने वाली कुल सप्लाई साल 2020 के बाद से अपने सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गई है।
मौजूदा समय में रूसी तेल भारत के पूरे ऊर्जा मिश्रण का एक बेहद अहम और महत्वपूर्ण हिस्सा बना हुआ है। मध्य पूर्व के देशों में चल रहे तनाव और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण होर्मुज जलडमरूमध्य के रास्ते से होने वाली तेल सप्लाई को लेकर किसी भी संभावित जोखिम के बीच भारत सरकार यह सुनिश्चित करना चाहती है कि देश के लिए ऊर्जा की आपूर्ति पर्याप्त और पूरी तरह सुरक्षित बनी रहे।
ऊर्जा सुरक्षा और अमेरिकी प्रतिबंधों का रुख
भारत अपनी कुल कच्चे तेल की जरूरत का लगभग 90 फीसदी हिस्सा विदेशों से आयात के जरिए पूरा करता है। ऐसी स्थिति में तेल की कीमत, उसकी आसान उपलब्धता और सप्लाई की निरंतरता ही भारत की पूरी ऊर्जा खरीद नीति के सबसे बड़े और मुख्य आधार माने जाते हैं। रूस से तेल खरीदने वाले बड़े देशों के खिलाफ अमेरिका की तरफ से किसी भी बड़ी कार्रवाई की आशंका के बावजूद भारत ने अपनी जरूरत के मुताबिक रूसी क्रूड खरीदना जारी रखा है।
पिछले महीने ही अमेरिकी सीनेट ने ‘लिंडसे ओ. ग्राहम सैंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट’ नाम के एक नए विधेयक को अपनी मंजूरी दी है। इस प्रस्तावित कानून के तहत रूस से कच्चा तेल खरीदने वाले प्रमुख देशों से होने वाले आयात पर 100 फीसदी तक का भारी-भरकम टैरिफ लगाया जा सकता है। हालांकि इस नए विधेयक को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का पूरा समर्थन हासिल है, लेकिन इसे अभी अमेरिकी प्रतिनिधि सभा से औपचारिक मंजूरी मिलना बाकी है।
भारत सरकार की तरफ से लगातार यह बात दोहराई जाती रही है कि उसकी तेल खरीद से जुड़े सभी फैसले किसी भी तरह की भू-राजनीतिक प्राथमिकताओं के आधार पर नहीं बल्कि पूरी तरह से कीमत, उपलब्धता और राष्ट्रीय ऊर्जा सुरक्षा जैसे व्यावहारिक और आर्थिक कारकों पर टिके हुए हैं। अगस्त महीने के ये ताजा आंकड़े भी साफ तौर पर यही इशारा करते हैं कि रूसी तेल के आयात में मामूली कमी आने के बावजूद मॉस्को भारत के ऊर्जा बाजार में अब भी सबसे अहम और बड़ा सप्लायर बना हुआ है।