सऊदी अरब का साफ ऐलान, फलस्तीन को लेकर सरकार का रुख सख्त, अल-अक्सा मस्जिद पर कही यह बड़ी बात.

सऊदी अरब की सरकार ने फलस्तीन के मुद्दे पर एक बार फिर से अपनी पुरानी और मजबूत स्थिति दुनिया के सामने रखी है। 27 अगस्त 2026 को सऊदी सरकार की तरफ से कई अहम बयान जारी किए गए, जिनमें फलस्तीन के समर्थन में देश की प्रतिबद्धता को पूरी तरह दोहराया गया। सऊदी सरकार ने यह साफ कर दिया कि अल-अक्सा मस्जिद के किसी भी तरह के बंटवारे को किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं किया जाएगा और वहां बार-बार हो रहे हमलों की कड़ी निंदा की जाती है। इस बारे में आधिकारिक जानकारी Saudi Press Agency के माध्यम से दी गई।
यरूशलम में बढ़ते तनाव के बीच सरकार का सख्त रुख
यह पूरा मामला ऐसे समय में सामने आया है जब यरूशलम शहर में तनाव काफी बढ़ गया है। इस दौरान इस्राइल के कुछ धार्मिक समूहों और संसद सदस्यों ने शनिवार के दिन अल-अक्सा मस्जिद में इस्राइली नागरिकों के प्रवेश को बढ़ाने की मांग को लेकर प्रदर्शन करने का आह्वान किया था। हालात तब और ज्यादा तनावपूर्ण हो गए जब इस्राइली अधिकारियों ने 26 अगस्त 2026 को मस्जिद के पास ही यरूशलम मामलों के फलस्तीनी मंत्री अशरफ अल-अवार को हिरासत में ले लिया। इस घटना की पूरी जानकारी Saudi Press Agency (Russian Service) पर साझा की गई थी।
राजनयिक संबंधों और शांति को लेकर सऊदी नीति
अल-अक्सा मस्जिद की घटनाओं से हटकर भी सऊदी अरब ने अपनी विदेश नीति को बहुत स्पष्ट रूप से दुनिया के सामने रखा है। सरकार ने यह बात फिर से दोहराई कि जब तक 1967 की सीमाओं के आधार पर एक स्वतंत्र फलस्तीनी देश का गठन नहीं हो जाता, जिसकी राजधानी पूर्वी यरूशलम हो, तब तक इस्राइल के साथ किसी भी तरह के राजनयिक रिश्ते यानी नॉर्मलाइजेशन की शुरुआत नहीं की जाएगी। रिपोर्टों से यह भी पता चलता है कि सऊदी अधिकारियों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हो रही उन कोशिशों को पूरी तरह खारिज कर दिया, जिनमें नागरिक परमाणु समझौतों को इस्राइल के साथ कूटनीतिक पहचान से जोड़ने की बात कही जा रही थी। इस बारे में विस्तार से Saudi Government Official Portal पर बताया गया है कि देश की स्थिति इस मामले में बेहद स्पष्ट और अडिग है।
सऊदी अरब का यह कड़ा रुख हाल ही में लिए गए उन कूटनीतिक फैसलों के बिल्कुल अनुकूल है, जो उसने अन्य देशों के साथ मिलकर उठाए हैं। उदाहरण के लिए, 25 अगस्त 2026 को फ्रांस के साथ मिलकर एक संयुक्त बयान जारी किया गया था। इस बयान में बस्तियों के विस्तार और बसने वाले लोगों द्वारा की जाने वाली हिंसा को तुरंत रोकने की मांग की गई थी। साथ ही यह भी जोर दिया गया था कि इस तरह की गतिविधियां दो-देशों के समाधान की संभावनाओं को कमजोर करती हैं।