Saudi Arabia: सऊदी अरब में आईटी और बिजनेस सर्विसेज को लेकर बड़ा अध्ययन शुरू, प्रवासियों पर पड़ेगा असर.

सऊदी अरब का प्राइवेट सेक्टर इन दिनों एक बड़े अध्ययन में जुटा हुआ है, जिसके तहत विदेशी कंपनियों से मिलने वाली आईटी और बिजनेस सेवाओं को वापस देश के अंदर लाने की योजना पर विचार किया जा रहा है। इस बात की पुष्टि फेडरेशन ऑफ सऊदी चैंबर्स के महासचिव सुल्तान अल-मुसल्लम ने 8 सितंबर 2026 को दुबई में आयोजित AIM Congress के दौरान की। इस पहल का मुख्य उद्देश्य यह समझना है कि सऊदी कंपनियां अभी तक विदेशी सर्विस प्रोवाइडर्स का इस्तेमाल क्यों कर रही हैं और किन शर्तों के तहत इन सेवाओं को देश के भीतर ही स्थानीय सप्लायर्स को सौंपा जा सकता है। अधिकारियों ने यह भी स्पष्ट किया कि यह अभी केवल एक अध्ययन का चरण है और इसे किसी तरह का प्रतिबंध या तुरंत अनुबंध समाप्त करने का सरकारी आदेश नहीं समझा जाना चाहिए।
अध्ययन के मुख्य बिंदु और भारतीय प्रोफेशनल्स पर संभावित असर
इस पूरी प्रक्रिया के दौरान लागत, सर्विस की क्वालिटी, विशेष विशेषज्ञता, काम पूरा करने की रफ्तार और अगले 12 से 24 महीनों की डिलीवरी क्षमता जैसे तमाम पहलुओं पर बारीकी से मूल्यांकन किया जा रहा है। आपको बता दें कि भारत लंबे समय से सऊदी बाजार के लिए टेक्नोलॉजी, फाइनेंस और प्रोफेशनल सेवाओं का एक प्रमुख हब रहा है। यदि आने वाले समय में ये कॉन्ट्रैक्ट्स सऊदी अरब की स्थानीय कंपनियों को शिफ्ट किए जाते हैं, तो भारत से जुड़े प्रोजेक्ट्स और वहां काम करने वाली टीमों पर इसका असर देखने को मिल सकता है। हालांकि, जो कुशल पेशेवर पहले से ही सऊदी अरब में मौजूद हैं, उनके लिए स्थानीय कंपनियों को आगे बढ़ाने और मजबूत करने के नए अवसर भी पैदा हो सकते हैं।
विदेशी सेवाओं पर खर्च और विजन 2030 का लक्ष्य
सऊदी अरब के जनरल अथॉरिटी फॉर स्टेटिस्टिक्स के आंकड़ों के मुताबिक, देश ने साल 2026 की पहली तिमाही में प्रोफेशनल और मैनेजमेंट कंसल्टिंग सेवाओं के आयात पर लगभग 8 अरब सऊदी रियाल यानी करीब 2.13 अरब अमेरिकी डॉलर खर्च किए थे। यह पूरा कदम देश के विजन 2030 के उस लक्ष्य के साथ मेल खाता है, जिसके तहत प्राइवेट सेक्टर के योगदान को मौजूदा 52 प्रतिशत से बढ़ाकर 65 प्रतिशत तक ले जाना है। इस रणनीति का मकसद केवल कर्मचारियों की संख्या बढ़ाना नहीं है, बल्कि देश के डेटा, आईटी सिस्टम और बिजनेस से जुड़ी विशेषज्ञता को सऊदी अरब के अंदर ही सुरक्षित रखना है ताकि ऑपरेशनल मामलों में देश पूरी तरह आत्मनिर्भर बन सके।
चुनौतियां और स्थानीय सामग्री के लिए नए नियम
सामने आ रहे अध्ययन में कुछ बड़ी चुनौतियों की भी पहचान की गई है, जिनमें खर्च बढ़ना, स्थानीय स्तर पर कुशल लोगों की कमी, काम बदलने में आने वाली जटिलताएं और डेटा माइग्रेशन का जोखिम शामिल है। इस बीच, लोकल कंटेंट एंड गवर्नमेंट प्रोक्योरमेंट अथॉरिटी ने सरकारी विज्ञापनों और टेंडर के लिए स्थानीय सामग्री के नियमों को पहले ही लागू करना शुरू कर दिया है। आने वाले समय यानी अप्रैल 2027 से 10 लाख रियाल या उससे अधिक मूल्य वाले प्रशासनिक कंसल्टेंसी टेंडर के लिए कम से कम 30 प्रतिशत स्थानीय सामग्री होना अनिवार्य कर दिया जाएगा, जिसे जनवरी 2028 से घटाकर 50 लाख रियाल या उससे अधिक मूल्य वाले टेंडर पर भी लागू कर दिया जाएगा। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत के जो कर्मचारी और कंपनियां इस क्षेत्र से जुड़ी हैं, उन्हें इन बदलावों पर करीबी नजर रखनी चाहिए क्योंकि आने वाले वक्त में उन्हें सऊदी अरब के भीतर ही अपने डिलीवरी सेंटर बनाने या स्थानीय साझेदारियों के साथ काम करने की जरूरत पड़ सकती है।