सियोल में फूटा गुस्सा, हारमुज जलडममध्य में सेना भेजने के खिलाफ सड़कों पर उतरे दक्षिण कोरियाई लोग.

Sushma Kumari10 September 20264 min read28 viewsWorld
सियोल में फूटा गुस्सा, हारमुज जलडममध्य में सेना भेजने के खिलाफ सड़कों पर उतरे दक्षिण कोरियाई लोग.

दक्षिण कोरिया में इन दिनों माहौल काफी गरम चल रहा है क्योंकि आम जनता देश की सेना को Strait of Hormuz में भेजने के प्लान के खिलाफ सड़कों पर उतर आई है। लोगों का कहना है कि सरकार को इस तरह के किसी भी मध्य पूर्व के संघर्ष में शामिल नहीं होना चाहिए क्योंकि इससे देश की सुरक्षा पर बड़ा खतरा पैदा हो सकता है। अल जजीरा के पत्रकार जैक बार्टन ने सियोल से यह पुष्टि की है कि वहां के आम नागरिकों के बीच इस सैन्य तैनाती को लेकर भारी विरोध देखने को मिल रहा है और लोग सरकार के इस कदम से बिल्कुल खुश नहीं हैं।

सियोल में अमेरिकी दूतावास के बाहर जोरदार प्रदर्शन

बीते 10 सितंबर 2026 को दक्षिण कोरिया की राजधानी सियोल में अमेरिकी दूतावास के पास भारी भीड़ जमा हुई और लोगों ने जमकर विरोध प्रदर्शन किया। प्रदर्शनकारियों के हाथों में अमेरिकी राष्ट्रपति के खिलाफ बैनर थे और वे किसी भी आक्रामक युद्ध में देश के शामिल होने का विरोध कर रहे थे। इससे ठीक एक दिन पहले यानी 9 सितंबर को लगभग 601 नागरिक समूहों के एक बड़े संगठन ने राष्ट्रपति कार्यालय की तरफ मार्च निकाला था। इस मार्च में पीपुल्स सॉलिडैरिटी फॉर पार्टिसिपेटरी डेमोक्रेसी, कोरियन कन्फेडरेशन ऑफ ट्रेड यूनियंस, ग्रीन पार्टी और जस्टिस पार्टी जैसे कई बड़े संगठन शामिल थे।

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विरोध प्रदर्शन के दौरान पीपुल्स सॉलिडैरिटी संगठन के Jung Kyung-jik ने चेतावनी दी कि इस तरह की सैन्य तैनाती का मतलब एक गैर-कानूनी युद्ध में सीधे तौर पर हिस्सा लेना होगा। इसके अलावा कोरियन पीस सॉलिडैरिटी फॉर सॉवरएन्टी एंड रीयुनिफिकेशन की Choi Young-ok ने साफ शब्दों में कहा कि सेना भेजने से हमारे सैनिकों की जान जोखिम में आएगी और बड़े पैमाने पर जान-माल का नुकसान हो सकता है।

जनता के बीच सर्वे में सामने आया कड़ा विरोध

हाल ही में कराए गए नेशनल बैरोमीटर सर्वे के आंकड़ों से यह साफ हो गया है कि देश के ज्यादातर लोग इस फैसले के खिलाफ हैं। यह सर्वे 7 सितंबर से 9 सितंबर 2026 के बीच एम्ब्रेन पब्लिक, केस्टेट रिसर्च, कोरिया रिसर्च और हानकूक रिसर्च द्वारा मिलकर किया गया था। इस सर्वे के मुताबिक 45% लोग सेना भेजने के सख्त खिलाफ हैं, जबकि केवल 36% लोग ही इसके समर्थन में खड़े हैं और 19% लोग ऐसे हैं जिन्होंने अभी तक इस पर कोई फैसला नहीं लिया है।

अगर उम्र और वर्ग के हिसाब से देखें तो 40 साल की उम्र वाले 54% लोग और 50 साल की उम्र वाले 59% लोग इस तैनाती के बिल्कुल विरोध में हैं। इसके अलावा खुद को उदारवादी बताने वाले 60% लोग भी इसके खिलाफ हैं। आपको बता दें कि इससे पहले मार्च महीने में गैलप कोरिया ने एक पोल कराया था जिसमें 55% लोगों ने युद्ध क्षेत्र में युद्धपोत भेजने का विरोध किया था। यह सारा विवाद साल 2026 की शुरुआत में उस समय शुरू हुआ था जब अमेरिका और इजराइल ने मिलकर ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई की थी और उसके जवाब में ईरान ने हारमुज जलडममध्य को पूरी तरह से बंद कर दिया था।

सरकार का पक्ष और आधिकारिक बयान

दक्षिण कोरिया के रक्षा मंत्रालय ने 8 सितंबर को यह पुष्टि की थी कि पिछले हफ्ते उनके अधिकारियों की एक टीम ने UAE का दौरा किया था ताकि वहां के जमीनी हालात और कामकाज की स्थिति का जायजा लिया जा सके। हालांकि मंत्रालय ने उन मीडिया रिपोर्ट्स को पूरी तरह खारिज कर दिया जिनमें कहा जा रहा था कि अमेरिका ने सेना भेजने के लिए नवंबर तक की कोई आखिरी तारीख तय की है। देश के राष्ट्रपति Lee Jae-myung का यही कहना है कि यह पूरा मामला अभी विचार के अधीन है और कोई भी अंतिम फैसला देश के राष्ट्रीय हितों और आम जनता की सहमति को ध्यान में रखकर ही लिया जाएगा।

राष्ट्रपति ने फ्रांस के राष्ट्रपति Emmanuel Macron के साथ अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा और नेविगेशन की स्वतंत्रता पर चर्चा के दौरान भी इस बात को दोहराया था। वहीं जनसंपर्क और संचार मामलों के वरिष्ठ राष्ट्रपति सचिव Seong Ghi-hong ने यह जानकारी दी कि सरकार बहुत सावधानी से स्थिति पर नजर बनाए हुए है। उन्होंने यह भी साफ किया कि सेना भेजने के इस प्लान का अमेरिका की तरफ से सेमीकंडक्टर आयात पर लगाए गए हालिया टैक्स या नीतियों से कोई लेना-देता नहीं है।

विशेषज्ञों की राय और आगे की स्थिति

कोरिया इंस्टीट्यूट फॉर डिफेंस एनालिसिस के विशेषज्ञ Yu Ji-hoon का मानना है कि भले ही रक्षा टीम ने संयुक्त अरब अमीरात का दौरा किया हो, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि सरकार ने कोई पक्का फैसला ले लिया है। दूसरी तरफ 세종 इंस्टिट्यूट के Shin Beom-chul का कहना है कि सरकार युद्ध क्षेत्र में सीधे सेना भेजने की बजाय दूसरे विकल्पों पर भी विचार कर सकती है, जैसे कि हथियारों से मदद देना या फिर समुद्री लुटेरों के खिलाफ काम कर रहे चेओंगहे यूनिट के मिशन को और बढ़ाना।

दक्षिण कोरिया के संविधान के नियमों के अनुसार देश से बाहर किसी भी सैन्य दल को भेजने के लिए नेशनल एसेंबली यानी संसद की मंजूरी लेना बेहद जरूरी है। इस बीच ईरानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता Esmaeil Baqaei ने पहले ही चेतावनी दे दी है कि अगर दक्षिण कोरियाई सेना हारमुज जलडममध्य के इलाके में आती है तो इसके बहुत गंभीर परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं।

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