संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में हुआ बड़ा खुलासा, इसराइल के वेस्ट बैंक हमलों को बताया अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन.

संयुक्त राष्ट्र मानव अधिकार की एक नई रिपोर्ट सामने आई है जिसमें यह बात साफ की गई है कि इस्राइली सैन्य अभियानों ने अंतरराष्ट्रीय कानून का गंभीर उल्लंघन किया है। 4 सितंबर 2026 को प्रकाशित इस रिपोर्ट में बताया गया है कि जनवरी और फरवरी 2025 के दौरान वेस्ट बैंक के तीन शरणार्थी शिविरों से पूरी आबादी को जबरन हटाया गया था। इस कार्रवाई के लगभग 20 महीने बीत जाने के बाद भी विस्थापित हुए लोग अपने घरों को वापस नहीं लौट पाए हैं और लगातार परेशानियों का सामना कर रहे हैं।
ऑपरेशन आयरन वॉल और जबरन विस्थापन की दास्तां
यह पूरा मामला 21 जनवरी 2025 को शुरू हुए बड़े सैन्य अभियान से जुड़ा है जिसे ऑपरेशन आयरन वॉल का नाम दिया गया था। इस अभियान के तहत जेनिन, तुलकरम और नूर शम्स शरणार्थी शिविरों को निशाना बनाया गया था। ह्यूमन राइट्स वॉच के आंकड़ों के अनुसार इस सैन्य कार्रवाई की वजह से करीब 32,000 लोगों को अपना घर छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा था। संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार प्रवक्ता थमीन अल-खेतन ने 17 मार्च 2026 को अपनी बात रखते हुए यह जानकारी दी थी कि यह लोगों को जबरन दूसरी जगह भेजने की एक सोची-समझी नीति थी जिसे युद्ध अपराध या मानवता के खिलाफ अपराध की श्रेणी में रखा जा सकता है।
लंबे समय से जारी सैन्य कार्रवाई और शिविरों की स्थिति
रिपोर्ट के अनुसार 4 सितंबर 2026 तक भी ये सैन्य अभियान लगातार जारी हैं और सरकारी आंकड़ों के मुताबिक जेनिन में यह अभियान 592 दिन, तुलकरम में 586 दिन और नूर शम्स में 560 दिन से ज्यादा समय से चल रहा है। इन लंबे सैन्य अभियानों के कारण कुल मिलाकर 40,000 से अधिक निवासी विस्थापित हो चुके हैं। हाल ही में इस्राइली सेना ने ओल्ड अस्कर और न्यू अस्कर शरणार्थी शिविरों में भी घुसपैठ की है जहां घरों की तलाशी ली गई, सामान को नुकसान पहुंचाया गया और कई आम नागरिकों के घरों को सैन्य चौकियों में बदल दिया गया। इसके अलावा कई फिलिस्तीनियों को भी पकड़ा गया है।
बेडौन बस्तियों पर अवैध बस्तियों का दबाव
एक तरफ जहां सैन्य कार्रवाई जारी है वहीं दूसरी तरफ अवैध बस्तियों के हमलों के कारण भी लोगों को अपनी जगह छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। जेरिको के उत्तर में स्थित शलाल अल-औजा समुदाय के कबनेह बेडौन कबीले के लगभग 20 फिलिस्तीनी परिवारों को आज अपना घर छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा। बेडौन अधिकार समूह अल-बैदार के महाप्रबंधक हसन मालीहत ने बताया कि लगातार डराने-धमकाने और इस तरह की हिंसा से बचाने वाला कोई नहीं होने के कारण इन परिवारों के पास भागने के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं बचा था। उन्होंने कहा कि यह जमीन पर कब्जा करने और नई बस्तियां बसाने की एक सोची-समझी कोशिश का हिस्सा है। जेनेवा सम्मेलनों के नियमों के मुताबिक किसी भी कब्जे वाले इलाके से नागरिकों को तब तक नहीं हटाया जा सकता जब तक कि बहुत जरूरी सैन्य कारण या सुरक्षा का मामला न हो। इसके साथ ही लड़ाई रुकने के तुरंत बाद इन लोगों को वापस लौटने का अधिकार भी होता है लेकिन संयुक्त राष्ट्र इन जबरन किए गए तबादलों को साफ तौर पर गैरकानूनी मानता है।