सऊदी अरब और अमेरिका के बीच बड़ी डिफेंस डील फाइनल, 5.75 अरब डॉलर में मिलेंगे टैंक और हथियार.

अमेरिका की ओर से सऊदी अरब के साथ एक बहुत बड़ी डिफेंस डील को मंजूरी दी गई है जो दोनों देशों के बीच के सुरक्षा रिश्तों को और मजबूत बनाती है। इस समझौते के तहत अमेरिकी सरकार ने सऊदी अरब को 5.75 अरब डॉलर यानी लगभग भारतीय रुपयों में बहुत बड़ी रकम के सैन्य साजो-सामान बेचने की हरी झंडी दे दी है। यह पूरा ऐलान अमेरिकी विदेश विभाग द्वारा 4 सितंबर 2026 को किया गया जिसमें मुख्य तौर पर टैंकों के इंजन और अन्य सुरक्षा उपकरण शामिल हैं।
अब्राम्स टैंक और आधुनिक हथियारों की होगी सप्लाई
इस बड़ी डिफेंस डील के अंतर्गत मुख्य रूप से AGT-1500 इंजन दिए जाएंगे जो Abrams टैंकों में इस्तेमाल होते हैं। इन इंजन के निर्माण की मुख्य जिम्मेदारी Honeywell कंपनी को सौंपी गई है जो इनकी सप्लाई करेगी। इसके अलावा इस पैकेज में Joint Direct Attack Munitions-Extended Range (JDAM-ER) किट्स और उससे जुड़े अन्य उपकरण भी शामिल हैं। हथियारों और किट्स से जुड़े इस हिस्से के लिए Boeing Corporation को मुख्य ठेकेदार बनाया गया है जो समय पर सभी जरूरी सामान उपलब्ध कराएगी।
यह नया रक्षा सौदा इसी साल अगस्त 2026 में हुई एक अन्य डील के बाद सामने आया है। उस दौरान सऊदी अरब ने 130 से ज्यादा अब्राम्स युद्धक टैंक और 20 बख्तरबंद रिकवरी वाहन खरीदे थे जिनकी कुल कीमत लगभग 1.15 अरब डॉलर थी। इन दोनों सौदों को मिला लिया जाए तो अब अमेरिकी सैन्य मंजूरियों का कुल आंकड़ा लगभग 6.9 अरब डॉलर तक पहुंच गया है। इस बारे में अधिक जानकारी आप Federal Register की आधिकारिक वेबसाइट पर देख सकते हैं।
क्षेत्रीय सुरक्षा और अमेरिकी विदेश नीति का उद्देश्य
अमेरिकी सरकार की तरफ से जारी आधिकारिक बयान में यह साफ कहा गया है कि यह प्रस्तावित बिक्री संयुक्त राज्य अमेरिका की विदेश नीति और राष्ट्रीय सुरक्षा के उद्देश्यों का पूरा समर्थन करती है। अधिकारियों ने बताया कि इस पहल का मुख्य मकसद सऊदी अरब की सुरक्षा को मजबूत करना है जो अमेरिका का एक प्रमुख गैर-नाटो सहयोगी देश है। इससे खाड़ी क्षेत्र में राजनीतिक स्थिरता और आर्थिक प्रगति को भी बढ़ावा मिलेगा।
अमेरिकी प्रशासन का मानना है कि इस नई खरीद से सऊदी अरब को वर्तमान और भविष्य के खतरों से निपटने में काफी मदद मिलेगी। इसके साथ ही सऊदी सेना और अमेरिकी, नाटो तथा अन्य क्षेत्रीय ताकतों के बीच तालमेल यानी इंटरऑपरेबिलिटी में भी सुधार होगा। विदेश विभाग ने इस बात पर भी जोर दिया कि इस लेन-देन से क्षेत्र के बुनियादी सैन्य संतुलन पर कोई असर नहीं पड़ेगा और न ही इससे अमेरिकी रक्षा तैयारियों में किसी तरह की कमी आएगी।