अमेरिका और इसराइल की ईरान पर जंग को पूरे हुए छह महीने, गल्फ देशों में बढ़ा आर्थिक संकट और तनाव.

अमेरिका और इसराइल की तरफ से ईरान पर शुरू की गई जंग को 31 अगस्त 2026 तक पूरे छह महीने हो चुके हैं। इस सैन्य संघर्ष की शुरुआत 28 फरवरी 2026 को हुई थी, जिसे अमेरिका ने 'ऑपरेशन एपिक फ्यूरी' नाम दिया था। इस शुरुआती सैन्य अभियान का मुख्य मकसद ईरान के सैन्य ठिकानों और बड़े नेताओं को निशाना बनाना था, जिसमें ईरान के तत्कालीन सुप्रीम लीडर अली खामेनेई की भी मौत हो गई थी। अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को लगा था कि यह युद्ध सिर्फ चार से छह हफ्ते में खत्म हो जाएगा, लेकिन उनका यह आकलन पूरी तरह से गलत साबित हुआ और युद्ध लंबा खिंच गया.
युद्ध में सीजफायर और हालिया हमले
इस भीषण संघर्ष के दौरान 8 अप्रैल 2026 को कुछ समय के लिए युद्धविराम हुआ था। इसके बाद जून के महीने में पाकिस्तान की मध्यस्थता से एक समझौता भी हुआ था, लेकिन इसके बावजूद दोनों तरफ से बीच-बीच में हमले जारी रहे। हाल ही में 30 अगस्त और 31 अगस्त 2026 को अमेरिका ने एक बार फिर सैन्य हमले शुरू किए और होर्मुज जलडमरूमध्य में स्थित लार्क द्वीप पर ईरान के दो रॉकेट लॉन्चरों को बमबारी करके तबाह कर दिया। इसके जवाब में ईरान ने जॉर्डन और संयुक्त अरब अमीरात यानी UAE में बने अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर ताबड़तोड़ हमले किए। इसके अलावा, होर्मुज जलडमरूमध्य में एक ईरानी तेल टैंकर के दो नौसैनिक खानों से टकरा जाने के कारण उसमें भीषण आग लग गई, जिससे समुद्री रास्ते पर खतरा और ज्यादा बढ़ गया.
ईरान को भारी आर्थिक नुकसान और महंगाई
इस जंग की वजह से ईरान को अब तक लगभग 270 अरब डॉलर यानी भारतीय रुपयों में बहुत बड़ी रकम का सीधा और अप्रत्यक्ष नुकसान उठाना पड़ा है। ईरान की नौसेना और वायु सेना पूरी तरह से तबाह हो चुकी है। ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन ने 31 अगस्त 2026 को एक बयान में कहा कि अमेरिका ने अपने वादों को पूरा नहीं किया है। उन्होंने देश की बदहाल होती अर्थव्यवस्था, आसमान छूती महंगाई और बेरोजगारी के लिए इस लगातार चल रही जंग, अमेरिकी प्रतिबंधों और 28 अगस्त को लगाए गए नौसैनिक नाकेबंदी को जिम्मेदार ठहराया। इस बीच, नए सुप्रीम लीडर मोतबा खामेनेई के कार्यालय ने अधिकारियों को सख्त निर्देश दिए हैं कि वे देश में खराब होती आर्थिक स्थिति का ज्यादा प्रचार न करें और इसे छिपाने की कोशिश करें.
गल्फ देशों और ऊर्जा बाजारों पर असर
इस युद्ध की वजह से पूरी दुनिया में ऊर्जा और तेल के बाजारों पर बहुत बुरा असर पड़ा है। अमेरिका और खाड़ी देशों के उसके साथी देश क्षेत्रीय अस्थिरता की वजह से लगातार खतरे में हैं। वहीं दूसरी तरफ, ईरान होर्मुज जलडमरूमध्य में अपने खुद के नियम लागू करके अपनी ताकत दिखाने की कोशिश कर रहा है। ओमान ने ईरान के साथ एक रेवेन्यू-शेयरिंग समझौता किया है ताकि वहां से अस्थायी रूप से जहाजों की आवाजाही को चालू रखा जा सके। इसके अलावा कतर ने भी समुद्री रास्तों से माइंस हटाने के कामों को लेकर बातचीत की है। इस पूरे क्षेत्रीय विवाद और हिंसा की वजह से ईरान, लेबनान, इसराइल और खाड़ी के अरब देशों में हजारों बेकसूर लोगों की जान जा चुकी है और लाखों लोग अपने घरों को छोड़कर पलायन करने के लिए मजबूर हो गए हैं, जिससे पूरी दुनिया की राजनीतिक स्थिति हिल गई है.