होर्मुज संकट के कारण भारत ने अमेरिका से मंगाई ज्यादा एलपीजी, ऊर्जा सप्लाई में आया बड़ा बदलाव.

Nura Basta8 September 20264 min read15 viewsIndia
होर्मुज संकट के कारण भारत ने अमेरिका से मंगाई ज्यादा एलपीजी, ऊर्जा सप्लाई में आया बड़ा बदलाव.

हार्मूज़ जलडमरूमध्य यानी Strait of Hormuz के रास्ते समुद्री जहाजों की आवाजाही रुकने के बाद भारत ने अपनी घरेलू रसोई गैस यानी एलपीजी की जरूरतों को पूरा करने के लिए अमेरिका की तरफ रुख किया है। भारतीय उपभोक्ताओं के घरों तक गैस पहुंचाने के लिए यह बदलाव बहुत बड़ा साबित हुआ है क्योंकि पारंपरिक रास्ते बंद होने के बाद स्थिति काफी बदल गई थी।

भारतीय आयात और अमेरिकी हिस्सेदारी में बड़ा बदलाव

Indian Express द्वारा साझा किए गए केपलर यानी Kpler के आंकड़ों से यह बात सामने आई है कि मार्च से अगस्त 2026 के बीच भारत के कुल एलपीजी आयात में अमेरिका की हिस्सेदारी 53 प्रतिशत रही। इस दौरान देश में कुल 7.14 मिलियन टन एलपीजी का आयात किया गया जिसमें से अकेले अमेरिकी आपूर्तिकर्ताओं ने 3.78 मिलियन टन गैस भारत को भेजी।

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यह आंकड़ा इससे पिछले छह महीनों यानी सितंबर 2025 से फरवरी 2026 के मुकाबले 281.1 प्रतिशत की भारी बढ़ोतरी को दिखाता है। उस पिछले दौर में अमेरिका की हिस्सेदारी कुल आयात की मात्र 7.9 प्रतिशत यानी 993,000 टन थी। संकट के इस समय में खाड़ी देशों से होने वाली सप्लाई पूरी तरह लड़खड़ा गई थी जिसके कारण कुल आयात में 43.1 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई। पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय के मुताबिक भारत अपनी जरूरत का लगभग 60 प्रतिशत एलपीजी आयात करता है और इस आयात का करीब 90 प्रतिशत हिस्सा सामान्य तौर पर होर्मुज के रास्ते ही गुजरता है।

खाड़ी देशों की सप्लाई में भारी गिरावट

केपलर के विस्तृत आंकड़ों से यह साफ होता है कि खाड़ी देशों से आने वाली एलपीजी की मात्रा में कितनी भारी कमी आई थी। संयुक्त अरब अमीरात यानी UAE से होने वाले शिपमेंट में 79.8 प्रतिशत की गिरावट आई और यह घटकर 958,000 टन रह गए। इसके चलते यूएई की बाजार हिस्सेदारी 37.8 प्रतिशत से गिरकर 13.4 प्रतिशत पर आ गई। कतर की हिस्सेदारी 21.1 प्रतिशत से फिसलकर 5.7 प्रतिशत रह गई और वहां से केवल 405,000 टन गैस ही आ सकी। कुवैत की सप्लाई 81.7 प्रतिशत घटकर लगभग 346,300 टन रह गई जबकि सऊदी अरब से आने वाली खेप में 76.1 प्रतिशत की गिरावट आई और यह 423,700 टन पर सिमट गई।

इस संकट से निपटने के लिए सरकार ने 8 मार्च को सभी रिफाइनरियों को आदेश दिया कि वे प्रोपेन और ब्यूटेन को घरेलू एलपीजी पूल में भेजें ताकि आम परिवारों को किसी तरह की दिक्कत न हो। इसके बाद 11 मार्च को हुई एक अंतर-मंत्रालयी बैठक में यह जानकारी दी गई कि इस कदम से घरेलू उत्पादन में 25 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है।

घरेलू रसोई और आम जनता की सुरक्षा

अधिकारियों ने देश भर में मौजूद 33 करोड़ से ज्यादा गैस कनेक्शन वाले घरों को प्राथमिकता दी ताकि रसोई गैस की सप्लाई में कोई रुकावट न आए। हालांकि, कमर्शियल और औद्योगिक उपयोगकर्ताओं जैसी गैर-घरेलू इकाइयों को गैस की सप्लाई में कटौती या समीक्षा का सामना करना पड़ा। सरकार ने 25 जून को यह रिपोर्ट दी कि गैर-घरेलू पैक्ड एलपीजी की सप्लाई दोबारा से पुराने स्तर पर आ गई है और रोजाना कम से कम 40,000 टन घरेलू उत्पादन लगातार जारी रखा गया है।

पेट्रोलियम योजना और विश्लेषण प्रकोष्ठ यानी PPAC की अगस्त महीने की रिपोर्ट के अनुसार, तमाम कोशिशों के बावजूद कुल खपत अगस्त 2025 के मुकाबले 16.15 प्रतिशत कम बनी रही। अमेरिकी प्रोपेन भले ही किफायती है लेकिन इसमें जहाजों को बहुत लंबा सफर तय करना पड़ता है और मालभाड़े का खर्च भी ज्यादा उठाना पड़ता है। Financial Express के 2 सितंबर के विश्लेषण के मुताबिक, अगस्त में खाड़ी देशों से होने वाली सप्लाई में कुछ सुधार दिखना शुरू हुआ और खाड़ी देशों की कुल हिस्सेदारी बढ़कर 31.3 प्रतिशत हो गई जबकि अमेरिकी गैस के आयात में महीने-दर-महीने 19.4 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई।

नए रास्तों की तलाश और भविष्य की योजनाएं

संयुक्त अरब अमीरात के राष्ट्रपति के सलाहकार अनवर गर्गश ने 8 सितंबर को यह बयान दिया कि उनका देश होर्मुज के रास्ते को छोड़कर अपनी पूर्वी तट की बंदरगाह और पाइपलाइन क्षमता का विस्तार कर रहा है। आने वाले समय में गैस खरीदने के लिए इन्हीं वैकल्पिक रास्तों पर ज्यादा ध्यान दिया जा सकता है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार सरकार ने साल 2027 के लिए अमेरिका से कुल एलपीजी आयात का 15 प्रतिशत हिस्सा सालाना अनुबंध के तहत खरीदने को लेकर चर्चा की है, हालांकि अभी तक इस संबंध में किसी औपचारिक नीति का ऐलान नहीं किया गया है।

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