पाकिस्तान में धार्मिक स्वतंत्रता पर जिनेवा में उठे गंभीर सवाल
Yemeni-Swedish journalist Luai Ahmed highlighted religious freedom issues in Pakistan at the UNHRC session in Geneva.

जिनेवा में आयोजित संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद (UNHRC) के 63वें सत्र के दौरान एक यमनी-स्वीडिश पत्रकार और स्तंभकार ने पाकिस्तान में धार्मिक स्वतंत्रता की स्थिति पर कड़े सवाल उठाए हैं। इस अंतरराष्ट्रीय मंच पर पत्रकार लुई अहमद तरबोश सईद ने पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों के अधिकारों और विशेष तौर पर निंदा कानूनों के दुरुपयोग का मुद्दा प्रमुखता से उठाया। उन्होंने पाकिस्तान सरकार से सीधे सवाल करते हुए कहा कि यदि देश धार्मिक स्वतंत्रता को लेकर गंभीर है, तो एक ईसाई महिला को केवल एक मैसेज साझा करने के आरोप में मौत की सजा क्यों सुनाई गई?
शगुफ्ता किरण का मामला और यूएनएचआरसी में गूंज
सम्मेलन को संबोधित करते हुए पत्रकार ने पाकिस्तान में ईशनिंदा कानून और शगुफ्ता किरण के चर्चित मामले का विशेष जिक्र किया। शगुफ्ता किरण एक ईसाई महिला हैं जिन्हें सितंबर 2024 में एक अदालत द्वारा मौत की सजा सुनाई गई थी। उनके ऊपर आरोप था कि उन्होंने व्हाट्सऐप के जरिए कोई ऐसा संदेश फॉरवर्ड किया था जिसे आपत्तिजनक माना गया। यह मामला लगभग तीन साल तक अदालत में चला। बचाव पक्ष का लगातार यह कहना रहा है कि शगुफ्ता ने उस संदेश को केवल आगे बढ़ाया था, न कि उसकी रचना की थी, लेकिन इसके बावजूद अदालत का फैसला उनके खिलाफ आया। इस मामले को लेकर अब मानवाधिकार हलकों में चिंता जताई जा रही है।
मध्य पूर्व और अन्य सरकारों की नीतियों पर भी टिप्पणी
जिनेवा में अपने संबोधन के दौरान लुई अहमद ने केवल पाकिस्तान तक ही सीमित न रहते हुए मुस्लिम बहुल देशों की अन्य सरकारों के मानवाधिकार रिकॉर्ड पर भी रोशनी डाली। उन्होंने ईरान में हुए प्रदर्शनों, सीरिया में अल्पसंख्यकों की स्थिति और फिलिस्तीनी क्षेत्रों में राजनीतिक शासन प्रणाली का जिक्र करते हुए सरकारों से अपनी नीतियों के लिए जवाबदेह होने की बात कही।
अपने निजी अनुभवों को साझा करते हुए उन्होंने बताया कि कैसे यमन में बड़े होने के दौरान वहां के लोगों को क्षेत्रीय समस्याओं के लिए बाहरी कारकों को दोषी ठहराना सिखाया गया था। हालांकि, उनका मानना है कि क्षेत्र की वास्तविक समस्याएं आंतरिक शासन, राजनीतिक व्यवस्था और नागरिकों के साथ होने वाले बर्ताव से जुड़ी हुई हैं।
मानवाधिकारों और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा की मांग
इस पूरे सत्र का मुख्य उद्देश्य विभिन्न देशों में मानवाधिकारों के दोहरे मानदंडों को उजागर करना और धार्मिक तथा राजनीतिक स्वतंत्रता के मामलों में पारदर्शिता की मांग करना था। जिनेवा के इस बड़े मंच पर पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों की सुरक्षा और न्याय प्रणाली को लेकर उठे इन सवालों ने एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस संवेदनशील विषय को चर्चा के केंद्र में ला दिया है।